कुम्हारियां को जाता हुआ कच्चा रास्ता।
- फोटो : Sirsa
चोपटा। स्वतंत्रता सेनानी का गांव कुम्हारिया अपने में 197 वर्ष का इतिहास समेटे हुए है। करीब 3600 की आबादी वाले इस गांव का रकबा 3602 एकड़ है। इसी गांव के स्वतंत्रता सेनानी धनराज डारा ने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान में उनके छह बेटे खेती कर जीवन बसर कर रहे है। वहीं गांव के 20 नौजवान फौज में भर्ती होकर देश की रक्षा में लगे हुए हैं। राज्य के अंतिम छोर पर बसा होने के कारण इस गांव की सुध नहीं ली जा रही है।
गांव में नहरी पानी कम मात्रा में पहुंचने के कारण ज्यादातर जमीन बिना बिजाई रह जाती है। बिजली के लटकते तार, बस सेवा, स्वास्थ्य सेवाएं, बिजली आपूर्ति, खेल सुविधा जैसी सेवाएं बेहद लचर हैं। बीमार होने पर 35 किलोमीटर दूर सिरसा जाना पड़ता है। ग्रामीणों की 50 वर्षो से एक ही मांग है कि गांव की फिरनी को पक्का किया जाए वह पूरी नहीं हो पा रही है। यहां तक कि गांव में बस तक नहीं जाती।
स्वतंत्रता सेनानी का स्मारक बनाने की मांग
स्वतंत्रता दिलवाने में शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानी धनराज डारा को उनकी आने वाली पीढ़ियां भी याद करें इसके लिए ग्रामीण उनके नाम स्मारक बनाने की मांग प्रशासन के आगे कई बार रख चुके हैं। हर बार पंचायत के आगे भी यह प्रस्ताव रखा जाता है। लेकिन अभी तक स्मारक नहीं बन पाया है।
1940 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की फौज में हुए थे भर्ती
गांव कुम्हारिया के स्वतंत्रता सेनानी धनराज डारा ने 1940 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में भर्ती होकर आजादी की लड़ाई लड़ी। देश की आजादी के बाद फौज में ही डीएससी की नौकरी की और 1962 को रिटायर हुए तथा 10 फरवरी 1997 को उनका देहावसान हुआ। धनराज डारा के पुत्र बलवान डारा ने बताया कि गांव में स्वतंत्रता सेनानी के नाम से ना तो कोई स्मारक बनाया गया है ना किसी गली इत्यादि का नामकरण किया गया है। सरकार स्वतंत्रता सेनानियों के वारिसों की ओर कोई खास ध्यान नहीं दे रही है। उनका कहना है कि सरकार को स्वतंत्रता सेनानियों के उत्तराधिकारी घोषित करना चाहिए और परिजनों को सरकारी नौकरी देनी चाहिए। उनका कहना है कि सरकार को गांव में स्मारक बनाकर प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।