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पीजीआई में ब्रेन स्ट्रोक पीड़ितों के लिए नहीं हैं इंजेक्शन

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प्रदेश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान पीजीआईएमएस में ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों को राहत का इंजेक्शन नहीं मिल रहा है। संस्थान में अरसे से इसकी सरकारी खरीद नहीं होने से मरीजों को इसे खुद बाजार से खरीद कर लाना पड़ रहा है। बाजार में इंजेक्शन 50 हजार रुपये तक मिलता है। संस्थान में स्थानीय स्तर पर खरीद के लिए आरसी (रेट कांट्रेक्ट) नहीं भी हो पा रही है। इस कारण इमरजेंसी परचेज भी संभव नहीं है।
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डब्लूएचओ लोगों को स्ट्रोक यानी अधरंग या लकवा से सुरक्षित रखने पर जोर दे रहा है। इसीलिए इस वर्ष स्ट्रोक से पहले स्ट्रोक के लक्षण को पहचाने थीम दिया गया है। इस थीम के तहत लोगों को जानकारी देकर जागरूक बनाने पर जोर दिया जाना है। जबकि पीजीआई में लकवा ग्रस्त होने से बचाने वाला इंजेक्शन तक नहीं है। ऐसे में जागरूकता के बावजूद किसी पीड़ित को स्ट्रोक से बचाना मुश्किल नजर आ रहा है। बाजार में यह इंजेक्शन इतना महंगा है कि आम आदमी तक इसकी पहुुंच नहीं है। दवा बाजार से जुड़े लोगों की मानें तो यह 50 हजार से 80 हजार रुपये में एक इंजेक्शन आता है। यह भी ऑर्डर पर ही उपलब्ध होता है। इसकी वजह इसका निर्धारित समय में उपयोग नहीं होने पर खराब होने की संभावना रहती है। इस स्थिति में विक्रेता को नुकसान का डर बना रहता है।
अधिकारियों को भेजा जा चुका है प्रपोजल
पीजीआई में बनी इंजेक्शन की कमी से अधिकारी अनभिज्ञ नहीं हैं। न्यूरोलॉजी विभाग की ओर से अधिकारियों को प्रपोजल भेजा जा चुका है। इसमें मरीजों का जीवन बचाने के लिए इंजेक्शन खरीदने की अपील की गई है। पिछले साल भेजे गए इस प्रपोजल के बाद दो बार रिमाइंडर भी दिया जा चुका है। इसके बावजूद इंजेक्शन की खरीद नहीं हो पाई है।
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संस्थान में नहीं हुआ है रेट कांट्रेक्ट
पीजीआई में दवा, उपकरण या अन्य सामान सरकारी एजेंसी खरीद कर देती है। यदि किसी विशेष सामान की जरूरत हो तो इमरजेंसी परचेज की जा सकती है। इसके लिए आरसी यानी रेट कांट्रेक्ट किया जाता है। इसके तहत संस्थान अपने स्तर पर खरीद कर सकती है। यह आरसी बनी ही नहीं है। इस कारण इंजेक्शन की स्थानीय स्तर पर खरीद नहीं हो पा रही है। जबकि सामान्य अस्पतालों में इंजेक्शन उपलब्ध हैं।
संस्थान में स्ट्रोक के मरीज आते हैं। इन्हें इलाज के लिए विशेष टीका लगाना होता है। इसकी खरीद के लिए प्रपोजल सरकार को भेजा गया है। वहां के फैसले के बाद ही अगला कदम उठाया जाएगा। मरीजों को उपलब्ध संसाधनों के तहत बेहतर उपचार दिया जा रहा है।
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- डॉ. सुरेखा डाबला, अध्यक्ष, न्यूरोलॉजी विभाग, पीजीआईएमएस
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