मूक-बधिर भी कहने और दूसरों की बात समझने में सक्षम हैं। हमें इनके संकेत समझने की जरूरत है। इन्हें दया नहीं सहयोग चाहिए। मेरा सपना इनमें से डॉक्टर, इंजीनियर व आईएएस बनते देखना है। उक्त बातें हरियाणा वेलफेयर सोसायटी फॉर पर्सन विद स्वीच एंड हीयरिंग इंपेयरमेंट (एचडब्ल्यूएसपीएसएचआई) की चेयरपर्सन डॉ. शरणजीत कौर ने कहीं हैं। वह वीरवार को पंडित लख्मीचंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विवि में अमर उजाला से अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस पर अपना अनुभव साझा कर रहीं थीं।
उन्होंने कहा कि मूक-बधिर लोगों का जीवन आसान हो सकता है। सांकेतिक भाषा (साइन लैंग्वेज) इसका बेहतर विकल्प है। यह भाषा उनके साथ आम लोगों को भी सीखनी चाहिए। इससे हम उनकी बात समझ व अपनी बात उन्हें समझा सकेंगे। एमएसडब्लू करने के बाद ट्रेनिंग के लिए एचडब्लूएसपीएसएचआई संस्थान से जुड़ी थी। यहां वर्ष 1994 में प्राचार्य के रूप में जिम्मेदारी संभाली। यहां के विद्यार्थियों की स्थिति देखी। उन्हें बोल कर पढ़ाया जाता था, जबकि वे सुन नहीं पाते थे। कोई सांकेतिक भाषा व अन्य व्यवस्था भी नहीं थी। यह क्षेत्र पूरी तरह से अछूता था। इस ओर काम शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी बात समझना व अपनी बात समझाना तो आसान हो गया, मगर लोगों को समझाना मुश्किल हो गया। पीएचडी के बाद मूक-बधिर लोगों के पुनर्वास के प्रयास शुरू किए। इस दौरान सांकेतिक भाषा का विचार आया। कक्षा से बाहर विद्यार्थियों के बीच होने वाली सांकेतिक बातचीत भी यही कहती थी। इस समस्या के समाधान पर जोर दिया। अब सांकेतिक के जरिये इनका जीवन सरल बन गया है।
मूक-बधिर विद्यार्थियों के लिए छोड़ दी प्राचार्य की नौकरी
डॉ. कौर ने बताया कि कनाडा में अपना प्रोफेशनल जीवन छोड़ कर यहां आई। मूक-बधिर विद्यार्थियों के लिए वर्ष 2017 में प्राचार्य की नौकरी छोड़ दी। राज्यपाल ने संस्था के चेयरमैन के रूप में बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी गई। अब पिछले चार साल से संस्था व इसके सदस्यों की बेहतरी के लिए हर संभव प्रयास करने पर जोर दिया जा रहा है। सबसे बड़ी समस्या वित्तीय संबंधी रहती है। इस समस्या का बेहतर प्रबंधन के जरिये समाधान तलाशा जा रहा है।
‘मूक-बधिराें को राहत पहुंचाने का प्रयास’
डॉ. शरणजीत कौर ने बताया कि उनका जन्म कैथल के भूसला में हुआ। जींद में ससुराल है। प्रदेश कार्यस्थली है। संस्था से जुड़कर मूक-बधिर लोगाें को राहत पहुंचाने का प्रयास है। इनकी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसके लिए समय कम पड़ जाता है। घर परिवार से समय निकालकर अपनी जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभाने का प्रयास है। डॉ. एमडीयू कुलपति प्रो. राजबीर सिंह की धर्मपत्नी हैं।