आमजन के बीच प्रदेश की राजनैतिक राजधानी के रूप में पहचान रखने वाले रोहतक लोकसभा के चुनावी समर को लेकर इस बार भी सभी की निगाहें यहां आ टिकी हैं। लेकिन इस बार के चुनावी हालात पहले से कुछ भिन्न हैं।
चूंकि निवर्तमान सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा जो कि रोहतक संसदीय क्षेत्र को मूल रूप से अपने कर्मक्षेत्र के रूप में आमजन को अवगत कराते हैं। स्वास्थ्य ठीक न होने से वे यहां नहीं पहुंच पा रहे हैं। जबकि गुड़गांव से निवर्तमान सांसद राव इंद्रजीत सिंह जो प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए महागठबंधन को लेकर नए समीकरण तैयार करने की परिपाटी तैयार कर रहे थे, वह भी मूर्त रूप नहीं ले पाया।
ऐसे में जाटलैंड के रूप में विख्यात रोहतक संसदीय क्षेत्र ने पूरे प्रदेश की राजनीति पर अपना व्यापक असर छोड़ा है। आगामी चुनावों में यह सीट क्या समीकरण बनाएगी, इसका सभी को बेसब्री से इंतजार है।
आंकड़ों की दृष्टि से अगर इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो वर्ष 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा, जो कि इन चुनावों में जीत अर्जित करने के बाद तीसरी बार सांसद बने थे, ने प्रदेश के कद्दावर नेता देवीलाल को मात्र 383 मतों के अंतर से पराजित किया था।
इसके बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा को इस जाटलैंड सहित पूरे प्रदेश में एक जाट नेता के रूप में अलग पहचान मिली थी। हालांकि 1999 के लोकसभा चुनाव में कारगिल की लहर के दौरान कैप्टन. इंद्र सिंह ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पराजित करते हुए रोहतक सीट पर अपना कब्जा जमाया था।
लेकिन उसके बाद वर्ष 2004 में हुए लोकसभा चुनाव की बात हो या पुन: 2005 में हुए बॉय इलैकशन भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके पुत्र दीपेंद्र सिंह हुड्डा यहां के मतदाओं की पहली पसंद में शुमार हो गए। जबकि वर्ष 2009 के चुनाव में तो दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने रिकार्ड मतों के अंतर से नफे सिंह राठी को पराजित करते हुए इस सीट पर विजय पताका फहराई थी।
रोहतक संसदीय क्षेत्र को लेकर एक अन्य रोचक संयोग यह भी है कि प्रदेश के गठन के बाद 1965 से 2009 तक रोहतक संसदीय क्षेत्र के लिए अभी तक 13 बार लोकसभा के चुनाव हो चुके हैं। इन सभी चुनावों में जीत हासिल करने वाले उम्मीदवारों के दल बेशक ही आपस में एक-दूसरे से जुदा हों, लेकिन वे सभी विशेष तौर पर जाट समुदाय से संबंध रखते हैं।
ऐसे में अभी तक की संसदीय यात्रा में किसी भी अन्य जाति का कोई भी उम्मीदवार ऐसा करिश्मा नहीं कर पाया है कि जिससे इस संयोग में कोई उल्टफेर संभव हो सके। जबकि वर्तमान समय में इस संसदीय क्षेत्र में 9 विधानसभा क्षेत्र के मतदाता अपने सांसद के चयन के लिए मतदान करते हैं और उनमें से कलानौर तथा झज्जर आरक्षित भी हैं।
रोहतक संसदीय क्षेत्र को सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ भी कहा जाता है और पिछले लगातार तीन चुनाव में जिस प्रकार से इस परिवार ने अपना इस सीट पर कब्जा जमा रखा है, उसे आगे के लिए बरकरार रखना भी उनकी प्रतिष्ठा का प्रशभन बना हुआ है। हालांकि कांग्रेसी नेता इस बार भी दीपेंद्र सिंह हुड्डा की जीत को सुनिश्चित मान कर चल रहे हैं। उनका तो यह भी कहना है कि वे जीत के अंतर को अधिक से अधिक बनाने के लिए प्रयासरत हैं।
क्षेत्र में कई महत्वाकांक्षी योजनाओं को लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है। लेकिन एकाएक चुनाव से पूर्व दीपेंद्र की चुनावी अभियान से गैरमौजूदगी क्या गुल खिलाती है, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है।
रोहतक संसदीय क्षेत्र को लेकर एक अन्य रोचक पहलू यह भी है कि यहां से भूपेंद्र सिंह हुड्डा ही ऐसे सांसद रहे हैं, जिन्होंने लगातार तीन बार 1991, 1996 व 1998 में जीत अर्जित करते हुए लगातार सांसद बने रहने का रिकार्ड बनाया है।
उनके पुत्र दीपेंद्र सिंह हुड्डा दो बार लगातार सांसद बने हैं। अन्य कोई भी 1967 के बाद इस रिकार्ड को दोहरा नहीं पाया है। वर्ष 2014 के चुनाव की बात करें तो अभी इसकी प्रक्रिया शेष है। ऐसे में निवर्तमान सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा के पास अपने पिता के इतिहास को दोहराने का मौका है।