रेवाड़ी का छोरा महेश कुमार अब लंदन तक साइकिल यात्रा की तैयारी में है। पहले हॉफ मैराथन, फिर मैराथन और उसके बाद साइकिल टूर करने के बाद वह विश्व रिकॉर्ड बनाने के लक्ष्य की ओर से बढ़ रहा है।
बड़ी बात यह है कि सभी से वह मिला मगर सहयोग के नाम से उसे ठेंगा ही मिला। 2 जनवरी 1997 को जन्मे बीसीए पास महेश कुमार ने पहली अप्रैल 2018 में 21 किलोमीटर की रेवाड़ी हॉफ मैराथन में हिस्सा लिया। यह पायलट चौक से कसौला चौक तक हुई जिसे प्रतिभागी को दो बार में पूर्ण करना था। इसके बाद उसने 105 किलोमीटर दूरी की मैराथन 24 घंटे में पंचकूला के चौधरी देवीलाल खेल स्टेडियम में पूर्ण की। उसके बाद इसका रुख रेवाड़ी से सिरसा साइकिल यात्रा की ओर हुआ जिसमें इसने फरवरी 2019 में 600 किलोमीटर दूरी तय की, जिसमें वह पूरे प्रदेश के दो जिलों को छोड़कर सभी जगह घूमा। 15 दिन में उसने पूरा प्रदेश कवर किया।
2020 में उसने 6 हजार किलोमीटर की साइकिल यात्रा शुरू की जिसमें 21 मार्च को केंद्र सरकार की ओर से कोविड की वजह से देश भर में लॉक डाउन लगा दिया गया। वह 2200 किलोमीटर की यात्रा कवर करके हुगली, पश्चिमी बंगाल तक पहुंच गया था मगर उसके बाद उन्हें वापस अपने घर लौटना पड़ा। 24 मार्च 2020 को उनकी घर वापसी हुई और यह यात्रा वह पूरी नहीं कर पाया। अगले साल 3 मार्च 2021 के दिन उन्होंने पुन: 6 हजार किलोमीटर की साइकिल यात्रा शुरू की जिसमें बीएमजी ग्रुप और जर्मनी की एक कंपनी लिंगल विंडो उसके सहयोगी बने। इस यात्रा में वह दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकता होकर वापस दिल्ली पहुंचा। 34 दिनों की इस यात्रा में उसने 85 शहर, 12 राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश को कवर किया। इस दौरान जगह - जगह उनके सेमिनार और स्वागत कार्यक्रम भी हुए। साल 2021 में दिसंबर छह से उसने जम्मू कश्मीर की डल झील से अपनी साइकिल यात्रा शुरू की और कश्मीर से कन्या कुमारी तक साइकिल यात्रा करने का निर्णय लिया। यह कुल 4 हजार किलोमीटर की यात्रा उसने 40 दिन में पूर्ण की जिसमें उसे रोटरी क्लब और अर्बन किंग होटल का सहयोग मिला। उनका अगला निशाना रेवाड़ी से लंदन तक साइकिल यात्रा का है। साइकिल यात्री महेश कुमार के अनुसार यह यात्रा सुनने और देखने में बहुत आसान है मगर इस लक्ष्य को हासिल करने में जगह-जगह पानी के पीने, मौसम में बदलाव और माहौल का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। यह यात्रा जीवन में परिवर्तन लाती है। हम ऐसी यात्रा से बहुत कुछ सीखते हैं नए लोगों से मिलते हैं उनके खान पान और संस्कृति से रूबरू होते हैं।
सबसे मुलाकात, मिला ठेंगा
साइक्लिस्ट महेश कुमार बताते हैं कि इस मुहिम में वे मुख्यमंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह, केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर, विधायक चिरंजीव राव, विधायक लक्ष्मण सिंह यादव से मिले मगर उनको मदद की बजाए निराशा हाथ लगी।
मदद का मिला भरोसा
इस कड़ी में उन्होंने डीसी यशेंद्र सिंह, एसपी राजेश कुमार, डीएसपी मोहम्मद जमाल, एसडीएम बावल संजीव कुमार, गृह मंत्री अनिल विज, खेल मंत्री संदीप सिंह ने इनकी बात गौर से सुनीं और अगली यात्रा में मदद का भरोसा दिलाया।
शहर में नहीं है साइकिल ट्रैक
शहर में साइकिल चलाने वालों के लिए अलग ट्रैक उपलब्ध नहीं हैं। साइकिल चलाने वाले मुख्य सड़क के साथ साइकिल चलाते हैं, जिनकी वजह से काफी बार साइकिल सवार वाहन चालकों की तेज रफ्तारी का शिकार भी हो जाते हैं।
साइक्लिंग अच्छी कसरत
- शहर में साढ़े तीन हजार से लेकर हजारों रुपये कीमत की साइकिलें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं लेकिन साइकिल चलाने वालों की संख्या यहां बहुत कम है।
साइकिल पर कम आते हैं अधिकारी
- जिले के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को साइक्लिंग का शौक तक है मगर अधिकांश अधिकारी सरकारी वाहनों से अपने कार्यालय आते हैं। एसडीएम बावल संजीव कुमार को छोड़कर अधिकांश अधिकारी साइकिल चलाने की आदत से दूर हैं क्योंकि इनको बहुत कम बार सरकारी कार्यालय साइकिल पर आते देखा गया है।