पानीपत। पिछले एक साल से चले आ रहे किसान आंदोलन में लगातार किसानों को राजनीति करने के नाम पर बदनाम किया गया। इस पर जिले के किसान नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि किसानों के नाम पर कोई किसान नेता न तो राजनीति कर रहा है न ही करेगा। यदि किसी को राजनीति करनी है तो किसान आंदोलन और किसानों के नाम पर न करें। किसी किसान नेता को राजनीति करने का मन है तो पहले भारतीय किसान यूनियन का पद छोड़े। किसान नेताओं ने कहा कि उनका आंदोलन पवित्र है, जिसमें उन्होंने केवल तीन कृषि कानून रद्द करने की मांग की थी।
किसान नेताओं का कहना:
भाकियू का पद छोड़े और फिर करें राजनीति
एक साल चले किसान आंदोलन में किसी भी किसान नेता ने राजनीति करने की कोशिश नहीं की। न ही किसी राजनीति पार्टी को समर्थन दिया था। इसके बाद भी किसानों को बदनाम करने की कोशिश की गई। यदि किसान आंदोलन के बाद किसी किसान नेता को राजनीति करनी है तो वह भारतीय किसान यूनियन के पद को छोड़कर करें, लेकिन किसानों के नाम पर राजनीति न करे। राजनीति करना कभी भी गलत नहीं है, बस शर्त यह है कि राजनीति पवित्र होनी चाहिए और जनता के हित में होनी चाहिए। - बिंटू मलिक , पूर्व उपप्रधान भाकियू
आंदोलन से पैदा होते हैं जनता के लिए अच्छे लीडर
आंदोलनों से स्वाभाविक तौर पर लीडर पैदा होते हैं। नेता वही है जो जनता के मुद्दों के लिए जमीनी स्तर पर संघर्ष करे। विधानसभा और संसद में जाने का अधिकारी जमीनी स्तर पर संघर्ष कर चुके आम जन नेता का बनता है। लोगों को भी समझना होगा कि अगर उनके बीच से संघर्षशील आंदोलनकारी लीडर राजनीति का हिस्सा बनेंगे तो फायदा निश्चित तौर पर मिलेगा। किसान आंदोलन को सही मायनों में सफल तभी माना जाएगा, जब आंदोलन समाप्ति पर संघर्षशील किसान नेताओं को विधानसभा और संसद में भेजा जाए। - सुधीर जाखड़, जिला प्रधान, भाकियू चढ़ूनी
बिन्टू मलिक।- फोटो : Panipat