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टीचरों को टीचर ही रहने दें, कर्मचारी न बनाएं

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अच्छे परिणाम चाहिए तो शिक्षकों को कर्मचारी न बनाएं : प्रो. कृष्ण कुमार
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- पीयू में आयोजित कार्यशाला में पद्मश्री एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक प्रो. कृष्ण कुमार ने की शिरकत
कहा- शिक्षक बच्चों की मां की तरह, टीचर्स को न तो डराएं और न ही उन पर दबाव बनाएं

फोटो---
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक पद्मश्री प्रो. कृष्ण कुमार ने कहा है कि शिक्षक मां की भूमिका अदा करते हैं। लेकिन अब उनसे तमाम कार्य करवाए जा रहे हैं और वह एक कर्मचारी की भूमिका में आ गए हैं। उन पर कॉलेजों का भी दबाव है और कई कॉलेजों में डर भी है। ऐसे स्थिति में शिक्षक अपना बेहतर नहीं दे पाता है। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षकों से बेहतर रिजल्ट चाहिए तो उन्हें शिक्षक ही रहने दें, कर्मचारी बनाने की कोशिश न की जाए। वे वीरवार को पीयू में आयोजित कार्यशाला में बोले रहे थे।
इस दौरान उन्होंने कहा कि शिक्षक बच्चों के रोल मॉडल होते हैं, इसलिए उन पर दबाव किसी प्रकार का न बनाया जाए। उन्हें स्वतंत्र छोड़ दिया जाए। उसके बाद बेहतर परिणाम आएंगे। उन्होंने कहा कि इसकी शुरुआत शिक्षक बनने से पहले प्रशिक्षण काल से ही होनी चाहिए। बीएड जब शुरू होता है तभी से इसकी पहल होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कहा कि वर्ष 2021 में होने वाले पीसा एग्जाम में चंडीगढ़ के स्टूडेंट्स भाग लेने जा रहे हैं। वर्ष 2009 में भी यह एग्जाम हुआ था, लेकिन उस समय स्थिति कजाकिस्तान से भी बुरी थी। रिजल्ट से पता चला कि पढ़ाने का आधार ठीक नहीं रहा। उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ शिक्षा विभाग को भी हर बार कुछ नया सोचने की जरूरत है, ताकि विद्यार्थियों को भी कुछ सीखने का मौका मिले। एक लीक पर चलने से कुछ अधिक सफलता नहीं मिल पाएगी।
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अभिभावक नौवीं के बच्चों को इंजीनियरिंग की कोचिंग नहीं दुनिया का ज्ञान दें
उन्होंने कहा कि सीसी पैटर्न जो शुरू किया गया है वह गलत नहीं है, उसे समझने व अडोप्ट करने में कुछ चूक हुई हैं। हम डर से परिणाम लेना चाहते हैं। ऐसा क्यों नहीं हो रहा कि रिजल्ट देना अनुशासन बन जाए। इसके लिए विद्यार्थियों को मोटिवेट करना होगा। घरों में भी यह काम शुरू होना चाहिए। उन्होंने अभिभावकों को नसीहत दी कि वह कक्षा नौ से ही बच्चों को इंजीनियरिंग, डॉक्टर व सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए कोचिंग सेंटर भेज देते हैं। यह समय बच्चों के कोचिंग जाने का नहीं, बल्कि दुनिया को समझने का है, जो जीवनभर काम आता है। इसी उम्र में बच्चे अपने अंदर दुनिया को जानने की इच्छा रखते हैं। उन्होंने कहा कि 12 से 15 साल की उम्र में बच्चों को किताबी ज्ञान को कम और दुनियाभर के ज्ञान के बारे में अधिक जानकारी देनी चाहिए।
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दिव्यांग बच्चों के साथ न करें भेदभाव
निट्टर के पूर्व प्रो. डॉ. जेएस सैनी ने आर्ट कॉलेज सेक्टर-10 में शुरू कराए गए इन्कूसिव एजुकेशन के संघर्ष के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उनका बेटा बोलने व सुनने में अक्षम था। उसके दर्द को समझने के बाद दिव्यांगता पर मैंने काम शुरू किया। पता लगा कि तमाम दिव्यांग बच्चों को सहूलियत ही नहीं मिल पा रही हैं। उनके लिए काफी काम किया। उन्होंने शिक्षकों से कहा कि दिव्यांग बच्चों को आम बच्चों जैसा ही समझें।
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