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फर्जी तरीके से 120 व्यापारियों ने कराया फसल का पंजीकरण, भौतिक सत्यापन के दौरान खेतों में मिली अलग-अलग उपज

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पलवल अनाज मंडी में आई धान की फसल। - फोटो : Palwal
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पलवल। जिले में अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के बाद अब ‘मेरी फसल-मेरा ब्योरा’ पोर्टल पर फर्जी तरीके से फसल पंजीकरण करने का मामला सामने आया है। किसानों की जमीन का पट्टानामा लिखवाकर व्यापारियों ने पोर्टल पर फर्जी पंजीकरण करवा लिया। जिला उपायुक्त कृष्ण कुमार ने फसल का भौतिक सत्यापन करवाया तो पोर्टल व खेतों में अलग-अलग फसल पाई गई। इसके बाद मामला उजागर हुआ। उपायुक्त ने मामले की जांच शुरू की तो 52 गांवों में पट्टानामा के आधार पर 120 व्यापारियों द्वारा फर्जी तरीके से फसल का पंजीकरण करवाया गया। व्यापारियों ने पोर्टल पर ज्यादा बाजरे की फसल का पंजीकरण करवाया, जबकि खेतों में अन्य फसल पाई गई। मामले में मार्केट कमेटी, कृषि विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों के संलिप्तता की भी जांच की जा रही है।
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दरअसल, सरकार द्वारा निर्धारित एजेंसियों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसल बेचने के लिए किसानों को ‘मेरी फसल-मेरा ब्योरा’ पोर्टल पर अपनी जमीन और फसल का पंजीकरण करवाना जरूरी है। पोर्टल के जरिये कृषि संबंधित जानकारी भी ले सकता है। खाद, बीज, कृषि ऋण व कृषि उपकरणों की खरीद पर सब्सिडी लेने के लिए भी पंजीकरण करवाना पड़ता है। प्राकृतिक आपदा के दौरान पंजीकृत फसल के हिसाब से ही नुकसान की भरपाई की जाती है। इस बार किसानों ने पोर्टल पर फसल मिसमैच की शिकायत उपायुक्त को दी। उपायुक्त ने पटवारियों से भौतिक सत्यापन करवाया तो फसल मिचमैच के साथ अन्य बातें सामने आईं। कई व्यापारियों ने 50 एकड़ जमीन का पट्टानामा के आधार पर पंजीकरण करवाया हुआ था। उपायुक्त का कहना है कि मामले की जांच जारी है। मामले में संलिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
बाजरे की सब्सिडी हड़पना चाहते थे व्यापारी
सरकार ने बाजरे के लिए 2250 रुपये और धान के लिए 1960 रुपये प्रति क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। बाजरे की फसल खरीदने की जगह सरकार ने 600 रुपये प्रति क्विंटल सब्सिडी देने की घोषणा की है। सब्सिडी लेने के लिए पोर्टल पर बाजरे का पंजीकरण आवश्यक है। ऐसे में व्यापारियों ने किसानों का पट्टानामा लिखवाकर पोर्टल पर बाजरे की फसल का पंजीकरण करवा दिया। अब बाजरे की व्यापारियों द्वारा ही खरीदारी होनी है तो बिना फसल खरीदे ही बाजरे की सब्सिडी व्यापारियों के खाते में आ जाएगी। इसके अलावा कम रकब और पंचायती जमीन का खसरा नंबर लेकर व्यापारी पोर्टल पर धान का पंजीकरण देते हैं, जिससे वे दूसरे राज्यों की फसल सस्ते रेट में खरीदकर सरकार को एमएसपी पर बेच देते हैं।
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सरकारी खरीद न होने से बढ़ता है फर्जीवाड़ा
सरकार द्वारा अब तक धान की खरीद ही की गई है। सरकारी खरीद न होने से किसानों को व्यापारियों को सस्ते दर पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है। व्यापारी फसल को सस्ते दर पर खरीद लेता है और बाद में सरकारी खरीद शुरू होने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच देता है। राजस्थान और यूपी के किसानों से सस्ती दर में खरीदी गई फसल को एमएसपी पर बेचा जाता है। पिछले साल भी कई आढ़तियों द्वारा इस तरीके से फसल एमएसपी पर बेचने का मामला सामने आया था।
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