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वामन द्वादशी : 25 साल के बाद आज फिर फिर जागृत होगी सदियों पुरानी परंपरा

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उत्सवों के शहर कुरुक्षेत्र में यह पहला अवसर है, जब 25 साल से बंद वामन द्वादशी महोत्सव को जागृत करने हरियाणा गवर्नर धर्मनगरी में पहुंचेंगे और दो दिवसीय मेले का उद्घाटन करेंगे। धर्मग्रंथों के अनुसार कुरुक्षेत्र दशावतारों में पहले पुरुष अवतार वामन भगवान का अवतरण और अंतर्ध्यान का साक्षी है, जिसका एक पौराणिक नाम कुरु जांगल प्रदेश भी है।
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गहनता से अगर कुरुक्षेत्र के अतीत पर नजर डाली जाए तो यह भूमि केवल गीता और महाभारत तक सीमित नहीं है। कई ऋषियों की तपोस्थली रहे कुरुक्षेत्र में उपनिषदों की भी रचना हुई। महाभारत से युगों पहले अनेक घटनाक्रमों के साक्षी कुरुक्षेत्र में ही वामन भगवान अवतरित हुए थे। इनमें महाभारत युद्ध, यानी द्वापर से भी एक युग पहले त्रेता युग में वामन भगवान ने देवताओं की माता अदिति की कोख से जन्म लिया था। कुरुक्षेत्र में उनके इस अवतरण दिवस को ही वामन द्वादशी महोत्सव के रूप में मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, मगर पिछले 25 वर्षों से यह परंपरा पीछे छूट गई थी, जिसे जागृत करने की भूमिका केडीबी, श्री ब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा और जीओ इंटरनेशनल सहित दर्जनों संस्थाओं के सहयोग से निभाई जाएगी।
सन्निहित का ये है महत्व
पवित्र सन्निहित सरोवर को सरस्वती नदी की सात सहायक नदियों का मिलन केंद्र कहा जाता है। मान्यता है कि यह सरोवर भगवान विष्णु का स्थायी निवास है। अमावस्या की रात को यहां सभी देवी देवता और तीर्थ एकत्रित होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति यहां सूर्य ग्रहण पर पूर्वजों का स्मरण कर सन्निहित सरोवर में स्नान दान करता है तो उसे 1000 अश्वमेध यज्ञों के बराबर फल मिलता है, जोकि राजाओं द्वारा अपनी संप्रभुता को साबित करने का प्राचीन वैदिक अनुष्ठान है। इसी वजह से तीर्थयात्री हर सूर्य ग्रहण के समय यहां आते हैं।
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मान्यतानुसार 10 अवतार हैं
सतयुग में चार अवतार हुए हैं। इनमें वराह, कुर्म, मत्स्य और नरसिंह अवतार हैं। त्रेता युग में भगवान के पांचवें और पहले पुरुष अवतार थे वामन भगवान। त्रेता युग के तीन अवतारों में वामन भगवान के बाद परशुराम और श्रीराम का अवतार हुआ द्वापर युग में दो अवतारों का उल्लेख मिलता है, ये हैं श्रीकृष्ण और बलराम। कलयुग में एक कल्कि अवतार का होने का उल्लेख भी मिलता है।
यहीं अवतरित हुए थे वामन भगवान
भगवान के वामन अवतार के बारे में उल्लेख मिलता है कि उनका अवतार और अंर्तध्यान इसी कुरुक्षेत्र में हुआ था। यानी कुरुक्षेत्र को वह गौरव प्राप्त है कि जहां पहले अवतार के रूप में वामन भगवान पहले पुरुष अवतार के रूप में अवतरित हुए थे। धर्मग्रंथों में उनका कदम 52 अंगुली का कद था। भगवान वामन का जन्मोत्सव देसी कैलेंडर के हिसाब से वामन द्वादशी भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को देश में कई प्रमुख स्थलों पर मनाया जाता है। वामन भगवान ने भक्त प्रह्लाद के पोते बलि को जमींदोज करने के लिए अवतरित हुए थे।
देवताओं की रक्षा के लिए माता अदिति का पयोव्रत अनुष्ठान
भगवान विष्णु ने अभिमन्यु पुर (गांव अमीन) स्थित अदिति कुंड पर अदिति माता को वामन रूप में अवतरित होने का वचन दिया था कि मैं बलि से रक्षा के लिए आपके गर्भ से जन्म लूंगा। अदिति तप ने यह तप पति ऋषि कश्यप के सुझाव पर अपने पुत्रों यानी देवताओं की बलि से रक्षा करने के लिए किया था। माता अदिति द्वारा अभिमन्यु पुर स्थित सूर्य कुंड पर पयोव्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके पश्चात भगवान ने माता अदिति के गर्भ से अवतार लिया और अवतार लेते ही त्रिगुणात्मक वामन रूप धारण तक लिया।
मां अदिति की कोख से जन्म लेने के साथ ही वामन भगवान के तीनों संस्कार, यानी उपनयन, जातकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार एक साथ किए गए, जिसमें स्वयं सूर्यदेव ने गायत्री मंत्र दिया, देवताओं के गुरु बृहस्पति ने यज्ञोपवीत दिया, माता अदिति ने कृष्ण मृग की छाल दी पहनने के लिए। आकाश के स्वामी ने उन्हें छत्र दिया, ब्रह्मा जी कंडलू दिया, माता सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला दी। कुबेर ने भिक्षापात्र दिया, जिसमें स्वयं माता पार्वती ने भिक्षा डाली।
कुरु जांगल प्रदेश में इंद्र की उपाधि की मंशा से बलि का अश्वमेध यज्ञ
कुरु जांगल प्रदेश (कुरुभूमि कुरुक्षेत्र) में इंद्र की उपाधि प्राप्त करने की मंशा से अपने गुरु शुक्राचार्य के साथ राजा बलि अश्वमेघ यज्ञों के आयोजन में व्यस्त थे। भगवान वामन ऋषि भारद्वाज के साथ राजा बलि से मिलने कुरु जांगल प्रदेश पहुंचे, उन्हें आते देख शुक्राचार्य ने राजा बलि को सचेत किया कि यह सामान्य ब्राह्मण नहीं हैं। अपनी कर्म निष्ठा और धर्मनिष्ठा का पालन करते ब्राह्मण स्वरूप वाले भगवान वामन का सत्कार किया और उनसे दान मांगने को कहा था।
और तीन पग भूमि मांगी, दो पग में नाप दिए धरती आकाश फिर
बलि के उत्तर में वामन भगवान ने तीन पग भूमि मांगी और राजा बलि का वचन प्राप्त होते ही भगवान अपने विराट स्वरूप में आ गए और एक ही पग से उन्होंने पूरी पृथ्वी को नाप दिया और दूसरे पग से आकाश, राजा बलि ने आदर सहित झुक कर अपना सिर भगवान के चरणों में झुका दिया और तीसरा पग अपने सिर पर रखने का आग्रह किया। राजा बलि की इस धर्मपरायणता से प्रसन्न होकर वामन भगवान ने उनको पाताल का शासन निरोगी रहते आठ मनमंत्र (एक मंत्र साढ़े तीस करोड़ साल का होता है) तक शासन करने का वरदान दिया और आठवें मनमंत्र में इंद्र बनने का भी वरदान दिया था।
कैथल के गांव ड्योड खेड़ी में है घटना साक्षी विष्णु पद तीर्थ
विष्णु पद नाम से यह स्थल वर्तमान में कैथल जिला (कुरुक्षेत्र के 48 कोस क्षेत्र) में स्थित ड्योडा खेड़ी गांव में है, जहां विष्णु पद नामक तीर्थ राजा बलि और वामन भगवान के संवाद एवं पूरे घटनाक्रम का साक्षी है। केरल में यह मान्यता भी है कि पाताल लोक से राजा बलि वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने और उनकी खुशहाली देखने आते हैं। इस दिन को वह ओणम उत्सव में मनाते हैं, जोकि विश्व भर में प्रसिद्ध है। यह पर्व मलयालम कैलेंडर के अनुसार चिंगम महीने में पड़ता हो, जोकि अगस्त सितंबर में आता है।
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