मां गंगा व्रज कोन्तेयन प्रयागं त्रिपुष्करम। तत्र गच्छ कुरुश्रेष्ठ यत्र प्राची सरस्वती।। सरस्वती तीर्थ स्थित श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर के मंदिर के प्रवेश द्वार पर गड़ा यह श्लोक मनुष्य को सद्गति का कारक है। कुरुक्षेत्र की पावन धरा से श्रीकृष्ण ने विश्व को गीता में जीने का मार्ग दिखाया तो प्राणी की सद्गति रास्ता भी आसान कर दिया।
बता दें विश्व प्रसिद्ध सरस्वती तीर्थ को पितरों के मुक्तिधाम के नाम से जाना जाता है। यहां हर वर्ष चैत्र चौदस के अवसर पर तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। इसमें हिमाचल प्रदेश, पंजाब, दिल्ली सहित देश के कोने से लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए पिंडदान करने पहुंचते हैं। इसी तीर्थ स्थल पर भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का मंदिर स्थित है। यह विश्व का इकलौता मंदिर है जहां पर कार्तिकेय पिंडी स्वरूप में विराजमान हैं। मंदिर में सैकड़ों साल से अखंड ज्योत प्रज्ज्वलित हैं। मान्यता है कि यह ज्योत श्रीकृष्ण ने कहने पर युधिष्ठिर ने प्रज्ज्वलित की थी। कार्तिकेय मंदिर के महंत दीपक गिरी ने बताया कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद युधिष्ठिर को युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए उनके सगे-संबंधियों की आत्माएं सताने लगी थीं, जिस कारण युधिष्ठिर मानसिक रूप से परेशान हो गए थे। तब इस संताप से बचने के लिए वह श्रीकृष्ण की शरण में गए। तब भगवान श्रीकृष्ण अपने साथ युधिष्ठिर को लेकर सरस्वती तीर्थ पहुंचे और युद्ध में मृत्यु का प्राप्त हुए उनके सगे संबंधियों की आत्मिक शांति के लिए कर्म पिंडदान कराया।
श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का मंदिर
सरस्वती तीर्थ पर भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का प्राचीन मंदिर है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर संस्कृत में उपरोक्त श्लोक गड़ा हुआ है, जिसे स्कंद पुराण से लिया गया है। यह श्लोक सरस्वती तीर्थ की महिमा व महत्व को दर्शाता है।