करनाल। वह 18 नवंबर 1942 का दिन था, जब अंग्रेजी हुकूमत के पंजाब गवर्नर को करनाल आना था। इसकी भनक कुछ दिन पहले ही कर्ण नगरी के क्रांतिकारियों को लग गई थी। उसी समय गवर्नर को बम से उड़ाने की योजना तैयार की गई। इसके लिए बम को तैयार करने की जिम्मेदारी से लेकर गवर्नर पर बम फेंकने तक की जिम्मेदारियां विभिन्न क्रांतिवीरों को सौंप दी गई थी।
मगर क्रांतिकारी बम तो नहीं बन सके, लेकिन एक हैंडग्रेनेड की जरूर व्यवस्था कर ली गई। लेकिन इससे पहले कि क्रांतिकारियों की यह योजना परवान चढ़ती, इन्हीं क्रांतिवीरों में से एक के पुलिस कर्मी भाई ने योजना को लीक करके गोरे हुक्मरानों तक पहुंचा दिया। परिणाम यह हुआ कि करनाल के पांच क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। कई महीने तक उन पर जुल्म ढाए गए। यातनाएं दी गई लेकिन गोरी सरकार आजादी के रणबांकुरों की जुबान नहीं खुलवा सकी। यह हैंड ग्रेनेड आज भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साधूराम के बेटे चंद्र प्रकाश के पास सुरक्षित हैं।
आजादी के लिए कुछ भी कर गुजरने का जज्बा रखने वाले साधूराम इंद्री क्षेत्र के खेड़ा गांव में रहते थे। युवावस्था में कदम रखते ही देश को अंग्रेजों से आजाद कराने का जज्बा भर गया। मिजाज से गर्म साधूराम ने अपने अन्य साथियों जिसमें नन्हेंड़ा गांव के आत्माराम, लाडवा के डा.विष्णु दत्त शर्मा, मुरादगढ़ के पंडित मूलचंद, धनौरा के मामराज, पटहेड़ा के रामदिया, कृष्ण लाल, रामप्रसाद अल्हावर आदि के साथ आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत के साथ बगावत शुरू कर दी। साधूराम के पुत्र चंद्रप्रकाश ने बताया कि 1930 में एक गुप्त बैठक की। जिसमें जलियाबाला बाग हत्याकांड सहित गोरी हुकूमत के बढ़ते जुल्मों सितम के खिलाफ मजबूत कार्ययोजना पर चर्चा की। गांव-गांव जाकर लोगों को जोड़ा गया। 1935 में खेड़ा गांव में ही साधूराम की अध्यक्षता में कांग्रेस की बड़ी सभा की गई। हालांकि इसमें कुछ अंग्रेज समर्थक भी पहुंच गए, उन्होंने सभा को विफल करने की कोशिश भी की।
11 जनवरी 1941 को नन्हेंडा गांव में आत्माराम के संयोजन में सभा की गई, जिसमें रामप्रसाद अलाहर का भाषण खत्म होते ही आत्माराम व रामप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। छह महीने की सजा भी हुई, लेकिन एक महीने बाद 11 फरवरी को यही पर फिर सभा की गई। जिसमें रोहतक के चौधरी रणवीर सिंह हुड्डा व कुरुक्षेत्र के बनारसी दास आदि कई क्रांतिकारी शामिल हुए। सभा खत्म हुई तो साधूराम को गिरफ्तार किया गया। उन्हें छह महीने की कठोर कारावास व 50 रुपये का जुर्माने की सजा मिली। उन्हें पहले तिहाड़ जेल, फिर फिरोजपुर जेल स्थानांतरित किया गया। यहां अन्य साथी भी मिल गए। भारी यातनाएं झेली। रिहा होने पर सूचना मिली कि 18 नवंबर 1942 को पंजाब का गवर्नर करनाल आने वाला है। इसके बाद क्रांतिकारियों की बैठक हुई और तय किया गया कि गवर्नर को बम से उड़ा दिया जाए। बम उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी डा.कृ ष्णा को तो बम फेंकने की जिम्मेदारी साधुराम को सौंपी गई। क्रांतिकारी बम तो तैयार नहीं कर सके लेकिन हैंडग्रेनेड का इंतजाम कर लिया। लेकिन क्रांतिकारियों में से एक का भाई पुलिस कर्मी था। एक क्रांतिकारी ने भाई के विश्वास में योजना को बता दिया और पुलिस कर्मी ने गवर्नर को उड़ाने की योजना के अंग्रेजी हुक्मरानों तक पहुंचा दी। इसके बाद साधुराम, विष्णु दत्त, आत्मा राम, मुंशीराम, रामप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। हैंडग्रेनेड बरामद करने के लिए छापामारी की गई। बहुत यातनाएं दी लेकिन क्रांतिकारियों ने जुबान नहीं खोली। यह हैंडग्रेनेड स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साधूराम के पुत्र चंद्रप्रकाश के पास आज भी मौजूद है।