करनाल। माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली हरियाणा पुलिस में सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) व पद्मश्री ममता सौदा का मानना है कि दुनिया में सफलता उसी के कदम चूमती है जो अपने लक्ष्य को तय कर ईमानदारी और अदम्य साहस के साथ आगे बढ़ता है। कमजोर मन से न तो जीवन में सफलता मिलती है, न ही किसी काम में, इसलिए मन की दुर्बलता को छोड़ इंसान को मंजिल की ओर कठिनाइयों की परवाह किए बिना बढ़ना चाहिए।
पद्मश्री ममता सौदा शुक्रवार की शाम को करनाल के अमर उजाला कार्यालय में पहुंची थी। जहां उन्होंने संवाद के दौरान अपने विचारों को बेबाकी से साझा किया। ममता ने इस दौरान माउंट एवरेस्ट को फतह करने के दौरान अपने संघर्ष के बारे में बताते हुए कहा कि किसी भी मंजिल को पाने में डर एक बहुत बड़ी बाधा बनता है। लेकिन हमें इस डर से डरना नहीं है, बल्कि उस डर की संभावनाओं को भांपते हुए सतर्कता, दृढ़ संकल्प व साफ नीयत के साथ अपनी मंजिल की ओर बढ़ना है। वह कहती हैं कि डर जरूरी है लेकिन डर को जीतने की कला भी आनी चाहिए, तभी मंजिल की राह आसान बनती है।
लोगों की सोच बदलने को तय किया लक्ष्य
ममता सौदा ने कहा कि बचपन में अपने आसपास के क्षेत्रों में जब लोगों को लड़कियों की बजाय लड़कों को अधिक महत्व देते देखती थी तो मन में कई तरह विचार आते थे। मन में आया कि लोगों की यह सोच बदलने के लिए और अपने देश के लिए कुछ करने के लिए उसे भी कुछ बड़ा करना चाहिए। प्रकृति प्रेमी तो शुरू से ही थी लेकिन लक्ष्य कोई नहीं था। स्नातक प्रथम वर्ष में उसने पर्वतारोहण के बारे में सुना। लेकिन जब एक संग्रहालय देखा, उसमें एक दीवार पर पर्वतारोहियों के नाम लिखे थे। उसमें हरियाणा के भी नाम थे। उनकी जीवनी भी थी, जिसमें बताया गया था कि उन्होंने कैसे अभ्यास किया। तभी से पर्वतारोही बनने की ठानी। 12 साल तक अभ्यास किया लेकिन फिर यह रास्ता छोड़ दिया लेकिन 1984 में एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल ने उन्हें प्रोत्साहित किया। जिससे फिर उम्मीद बंधी। लक्ष्य तय किया लेकिन इस डगर में कठिनाइयों को देखते हुए माता पिता मना करने लगे, लेकिन जब समझाते हुए बताया कि मुझे यह अच्छा लगता है, मैं करना चाहती हूं तो उन्होंने इजाजत दे दी।
दोहरे झटके के बाद खुद को फिर तैयार किया
जब मन में पर्वतारोही बनने की ठानी तो यूथ व स्पोर्ट्स के शिविरों में जाना शुरू किया। दो अच्छे निर्देशक मिले। एडवांस कोर्स किया। नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेरियन में दाखिला लिया। लेकिन इसी बीच एक दुर्घटना हुई और पैर में चोट लग गई। जिसे ठीक करने में दो साल लग गए। लेकिन जब ठीक हुई तो इससे पहले ही पिता दुनिया छोड़ गए। आसपास के लोगों से ताने भी सुनने को मिले, जिसने मुझे जुनून और ताकत दी। दोहरा झटका लगने के बाद भी खुद को फिर तैयार किया। फिर मनाली में पर्वत पर चढ़ाई शुरू की। इसके बाद लगातार संघर्ष चलता रहा।
आर्थिक तंगी से पार पाने को किया कड़ा संघर्ष
माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के लिए 18 लाख की फीस सहित कुल 21 लाख रुपये का खर्च आना था। ममता के अनुसार उनके पास तो एक लाख रुपये भी नहीं थे। परिजनों से विचार-विमर्श किया तो मां ने घर को गिरवी रखकर धन जुटाने की बात कही लेकिन उसने मना कर दिया। इसके बाद फतेहाबाद में एक कॉलेज में तीन साल तक बतौर लेक्चरर काम किया। वार्डन भी बनीं और डबल ड्यूटी की। एक दिन कॉलेज के प्रबंध निदेशक को अपनी इच्छा बताई तो उन्होंने उम्मीद से ज्यादा सपोर्ट किया तो प्रैक्टिस शुरू हो गई। इसके बाद पर्वतारोहण का दौर शुरू हो गया। चोटी दर चोटी चढ़ती रही। 2009 में तय हो गया कि वह एवरेस्ट जा सकती हूं लेकिन फिर समस्या आई कि 21 लाख रुपये कहां से आएंगे। फिर कैथल की उपायुक्त अमनीत पी. कुमार से मिलीं। उन्हें सारी बात बताई तो उन्होंने लीक से हटकर भी मदद की। आखिरकार, धनराशि का इंतजाम हो गया। 22 मई 2010 में सारी प्रक्रियाएं पूरी करते हुए माउंट एवरेस्ट को फतह कर दिया।
एवरेस्ट से शवों को भी नीचे लेकर आई ममता
ममता के अनुसार माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना तो बड़ी बात है ही, लेकिन वहां से सुरक्षित नीचे उतरना भी कम बड़ी बात नहीं है। पैर की कमजोरी के बावजूद अत्यधिक डर के बीच सफलता पूर्वक नीचे आईं। इको माउंटेन मुहिम के तहत वापसी के दौरान वह एक ऐसी टीम का हिस्सा बन गईं, जिन्हें माउंट एवरेस्ट के कचरे को साथ नीचे लाना था। इस दौरान वहां तीन लाशें मिलीं, वे सभी पर्वतारोही थे, जो कभी लौटे नहीं। एक शव की तो मात्र हड्डियां ही बचीं थी, मांस गल चुका था। उनकी टीम इन शवों को नीचे तक लेकर आई। यह काम भी बहुत कठिन था। लेकिन टीम ने इसे पूरा करने के लिए ठान लिया था। इसी के साथ-साथ पहाड़ों से काफी कचरा भी नीचे लाया गया।
बेटियां हिम्मत न हारें
बेटियों से अपील करते हुए ममता ने कहा कि वे कभी हिम्मत न हारें। कभी मुश्किलों से न घबराएं। उनके समक्ष जो दिक्कतें पेश आ रहीं हैं, उनका डटकर मुकाबला करें। जीवन में लक्ष्य तय करें और उसकी प्राप्ति के लिए कड़ी मेहनत के साथ जुट जाएं। अभिभावक भी अपनी बेटियों को घर के कामकाज तक ही सीमित न रखें, बल्कि उनकी रुचि अनुसार उनका हौसला बढ़ाते हुए उन्हें सफलता की बुलंदी तक पहुंचाने में मददगार बनें।