15-कैथल। पूर्व सैनिक कैप्टन बलजीत मौर।
- फोटो : Kaithal
जब पाकिस्तान ने चुपके से कारगिल में घुसपैठ कर ली थी, तब भारतीय सेना के जवानों ने मुंह तोड़ जवाब दिया था। कारगिल की लड़ाई में कैथल के कई जवान भी दुश्मन सेना को लोहा मनवा चुके हैं। ऐसे ही एक जांबाज हैं भूतपूर्व सैनिक कैप्टन बलजीत मोर। उन्होंने बताया कि वह सन 1983 में सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे और 31 अक्तूबर 2014 को कैप्टन के पद से रिटायर हुए हैं। उन्होंने बताया कि वह इनफेंट्री सेना का जवान था, जो हिंदुस्तान में सब पोस्टों पर पैदल चलकर जाते थे।
सन 1999 मई में सेक्शन कमांडर से आदेश मिला था कि बंकरों ने कारगिल में हमारी कई पोस्टों ट्रेनिंग देने के नाम पर पूरे साजो सामान लेकर पर कब्जा कर लिया है। उसके बाद कई जवानों को ट्रेनिंग देने के नाम पर पूरे साजो सामान लेकर कारगिल में भेजा गया। जून माह में पेट्रोलिंग ड्यूटी लगाई गई। पोस्टर नंबर 5060 पर उनको भेजा गया। जहां से वह दिन रात कारगिल क्षेत्र की कई पोस्टों पर पेट्रोलिंग करने लगे। पाकिस्तान की ओर से हिंदुस्तान में घुसने की कवायद की गई, तो दोनों सेनाओं की ओर से गोलीबारी शुरू हुई। जिसमें हमारी रेजिमेंट के कई जवान शहीद हुए, हमारी सेना ने भी पाक सेना के कई गुणा सैनिकों को मौत के घाट उतारकर 26 जुलाई को अपनी पोस्टों को छुड़वा लिया था।
इसी दिन से 26 जुलाई को विजय दिवस के नाम से जाना जाने लगा। उसने प्रशासन से कारगिल दिवस को जिला स्तर पर भी मनाने की मांग की। जिससे युवाओं में भी सेना में भर्ती होने का जज्बा पैदा होगा।
परिवार में है राष्ट्र के प्रति भावना
कैप्टन ने बताया कि उसके परिवार में सेना में भर्ती होने का पूरा जज्बा है। इस समय में उनका बेटा गलवा घाटी में तैनात है और तीन भतीजे भी जम्मू कश्मीर में ही अल-अलग जगहों पर तैनात है। देश की रक्षा के लिए पूरा परिवार तत्पर रहता है।
उन्हें वर्ष 2004 में उन्हें पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम द्वारा सम्मानित किया गया। वर्ष 2004 में ही उनको विदेश में वहां के सैनिकों को एक महीने की ट्रेनिंग देने के लिए भेजा गया था। 32 वर्ष तक देश की रक्षा करने के बाद वह 31 अक्तूबर 2014 को सेवानिवृत्त हो गए। संवाद