फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जिले के दो भाइयों ने विदेशी कंपनी का एक लाख रुपये माह का ऑफर ठुकरा साबित किया प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं

विज्ञापन
विज्ञापन
प्रतिभाशाली युवा अक्षय व आकाश को लकड़ी से सांस्कृतिक धरोहर बनाने में है महारत हासिल है। इससे साफ है कि प्रतिभा किसी परिचय की मोहताज नहीं होती। जींद जिले के रामनगर निवासी युवा दो भाईयों अक्षय और आकाश में लकड़ी से सांस्कृतिक धरोहर बनाने का ऐसा जनून है कि जो किसी वस्तु को एक बार देख लें तो उसकी कलाकृति तैयार कर देते हैं। उनकी इस कला की प्रसिद्धि देश की सीमाओं को लांघकर विदेशों तक फैल चुकी है। देश-विदेश के लाखों लोग उनके द्वारा तैयार की गई कलाकृतियों की सराहना कर चुके हैं। लकड़ी की इन कलाकृतियों की जानकारी जन जन तक पहुंचाने के लिए अक्षय और आकाश ने खुद का चैनल भी शुरू किया है।
विज्ञापन

इस चैनल से देश व विदेशों से 70 लाख से अधिक दर्शक जुड़ चुके हैं। शुरुआती दिनों में इस चैनल के माध्यम से इनको अच्छी कमाई हो रही है हालांकि इससे होने वाली इस कमाई को वह इसी कार्य पर खर्च कर रहे हैं। पिछले लगभग तीन माह पहले ऑस्ट्रिया की क्रॉफ्ट पांडा कंपनी ने इन प्रतिभाशाली युवाओं को अपनी कंपनी में एक लाख रुपये मासिक का आफर दिया था लेकिन दोनों भाईयों ने प्रधानमंत्री के कौशल भारत के सपने व स्वदेशी की को पूरा करने के लिए खुद ही काम करने का निर्णय लिया। इनकी इच्छा है कि देश की सांस्कृतिक धरोहर की जानकारी देश के युवाओं तक पहुंचाना ही पहला लक्ष्य है।
इन दोनों युवाओं में लकड़ी से कलाकृतियां तैयार करने का ऐसा जनून है कि एक बार अक्षय को लकड़ी काटने के दौरान हाथ पर गंभीर चोटें आ गई, लेकिन कलाकृतियां तैयार करने का जनून फिर भी कम नहीं हुआ। चोट से उबरने के बाद इन युवाओं ने विलुप्त होती पुरानी हवेलियों, बैलगाड़ी, छकड़ों, पुरानी आटा चक्की समेत अनेक सांस्कृतिक धरोहर की लकड़ी की ऐसी कलाकृतियां तैयार की। जिन्हें देखने वालेे दंग रह गए।
विज्ञापन

यहीं नहीं अक्षय तथा आकाश आधुनिक गाड़ियों, मोटरसाइकिलों की भी शानदार कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं। अक्षय व आकाश ने जींद के राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान से पेंटर और वेल्डर का डिप्लोमा किया हुआ है। अक्षय एवं आकाश गरीब परिवार से हैं। इनके पिता हरिराम आटा चक्की संचालित कर परिवार का पालन पोषण करते हैं।
इन दोनों भाईयों की इस कलाकृति से प्रसन्न होकर राज्यपाल ने 2015 में इनको करनाल में सम्मानित किया। इसके अलावा सीरआरएसयू में कुलपति तो जींद डीसी ने भी सम्मानित किया।
दोनों भाईयों को बचपन से ही कागज के टुकड़ों के साथ विभिन्न प्रकार की कला बनाने का शौक था। जिसके चलते वह लकड़ी व कागज के खिलौने बनाते थे। इसके बाद स्कूल व आईटीआई में होने वाली प्रतियोगिताओं ने इनक ी कला को अधिक निखारने का काम किया।
इन दोनों भाईयों की कला पर देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी किसी को शंका नहीं है, इसके बावजूद भी इन दोनों को उम्मीद है कि सरकार उनको एक आर्ट गैलरी उपलब्ध करवाए ताकि वह अपनी इस कला के काम को बेहतर तरीके से कर सकें।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें