लोहड़ी पर्व पर भंगड़ा करती युवतियां।
बहादुरगढ़। सुंदरी-मुंदरिए, तेरा कोन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो, गई लोहड़ी वे..बना लो जोड़ी वे..जैसे पारंपरिक गीत-संगीत के साथ लोहड़ी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। शहर में पंजाबी समाज ने धूमधाम से इसे मनाया। गीत-संगीत ढोल-नंगाड़ों की थाप पर लोगों ने जमकर भंगड़ा किया। गले मिलकर लोहड़ी की शुभकामनाएं दी। शहर में कई स्थानों पर लोहड़ी पर्व पर कार्यक्रम हुए।
लोहड़ी को लेकर शहर में जगह-जगह मूंगफली गज्जक की दुकानें सजी थी। बच्चों ने सुबह से ही लोहड़ी मांगना शुरू कर दिया था। शाम को सूर्य ढलने के बाद धूमधाम से लोहड़ी जलाई गई। घरों में कई प्रकार के पकवान बनाए गए। शहर के हर गली मोहल्ले में ढोल-नंगाड़ों की थाप पर पारंपरिक गीतों पर नृत्य कर लोहड़ी जलाई गई। लोहड़ी पर्व पर महिलाओं ने आओ भंगड़ा पाएं, लोहड़ी मनोदी करो तैयारी..., आग दे कोलरे आओ, सुंदर, मुंदरिए जोर नाल गाओ, आ गई लोहड़ी वे, बना लो जोड़ी वे...जैसे पारंपरिक लोहड़ी के गीत गाए। बच्चे, बड़े और बुजुर्ग ने एक-दूसरे को गले-मिलकर लोहड़ी की बधाई दी।
क्या है मान्यता
लालचंद कॉलोनी निवासी रविंद्र मल्होत्रा ने बताया कि लोहड़ी से जुड़ी प्रमुख लोककथा दूल्हा भट्टी की है जो मुगलों के समय का एक बहादुर योद्धा था। जिसने मुगलों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ कदम उठाया था। एक ब्राह्मण की दो लड़कियों सुंदरी मुंदरी के साथ इलाके का मुगल शासक जबरन शादी करना चाहता था। इस मुसीबत की घड़ी में दुल्ला भट्टी ने ब्राह्मण की मदद की और लड़के वालों को मना कर एक जंगल में आग जलाकर सुंदरी मुंदरी का ब्याह कराया। दूल्हे ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। इसी कथा की हिमायत करता लोहड़ी का यह गीत है, जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है सुंदर, मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो, दूल्हा भट्टी वाला हो, दूल्हे धी (लड़की) व्याही हो, सेर शक्कर पाई हो।