विरेंद्र को पद्मश्री अवॉर्ड से नवाजते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद।
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मूक बधिर पहलवान विरेंद्र सिंह उर्फ गूंगा को राष्ट्रपति भवन में जैसे ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया हरियाणा के झज्जर में सासरौली गांव के लोगों की खुशी की वजह से आंखें नम हो गई। इस नजारे को टीवी पर देख रहे ग्रामीणों ने गांव के छोरे के हाथों में प्रतिष्ठित अवॉर्ड लेते ही जश्न मनाना शुरू कर दिया। गांव में जश्न का ये आलम दूसरे दिन मंगलवार तक जारी रहा।
पहलवान विरेंद्र सिंह के पिता अजीत सिंह, सीआईएसएफ (केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल) से रिटायर्ड हैं और दिल्ली में एक अखाड़ा चलाते हैं। हालांकि उनका परिवार सासरौली गांव में ही रहता है। विरेंद्र डेफ ओलंपिक में कई बार स्वर्ण पदक प्राप्त कर चुके हैं। हालांकि उनकी संघर्ष गाथा कम नहीं रही है। दिव्यांगता की वजह से उनका बचपन चुनौतियों भरा रहा।
बचपन में पैर में चोट लगने पर उन्हें इलाज के लिए पिता के पास दिल्ली भेजा गया। इलाज के बाद उनके पिता अजीत सिंह चाहते थे कि विरेंद्र गांव चले जाएं लेकिन मित्र सुरेंद्र सिंह ने विरेंद्र को वापस नहीं जाने दिया। सुरेंद्र को मूकबधिर विरेंद्र से काफ़ी लगाव था, इसलिए वे विरेंद्र को अपने साथ सीआईएसएफ अखाड़ा ले जाने लगे।
अजीत सिंह और सुरेंद्र, दोनों ही पहलवान थे और अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद यहां आकर बाकी जवानों के साथ कुश्ती लड़ते थे। पिता और मुंहबोले चाचा को देखकर वीरेंद्र की भी कुश्ती में दिलचस्पी बढ़ने लगी । इसके बाद उसने जोर अजमाना शुरू किया। विरेंद्र की प्रतिभा को सुरेंद्र सिंह ने ही सबसे पहले पहचाना और फिर उन्होंने उसके प्रशिक्षण का दायित्व निभाया। हालांकि उनके जुनून के लिए पूरे परिवार ने उनका साथ दिया।
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दिव्यांग की वजह से वर्ल्ड चैपिंयनशिप में हिस्सा नहीं ले सके
गांव के रामबीर डागर ने बताया कि विरेंद्र सिंह ने देश का नाम कुश्ती के क्षेत्र में रोशन किया है। हरियाणा और आस-पास के राज्यों के दंगलों में अपनी धाक जमाने के बाद, साल 2002 में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। वर्ल्ड कैडेट रेसलिंग चैंपियनशिप 2002 के नेशनल राउंड्स में गोल्ड जीता। इस जीत से उनका वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए जाना पक्का था परंतु उनकी दिव्यांगता को कारण बताते हुए फेडरेशन ने उन्हें आगे खेलने के लिए नहीं भेजा। उन्हें साल 2005 में डेफलिम्पिक्स (पहले इन खेलों को ‘द साइलेंट गेम्स’ के नाम से जाना जाता था) के बारे में पता चला। उन्होंने इसमें भाग लिया और गोल्ड जीता। इसके बाद विरेंद्र सिंह ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ‘डेफ केटेगरी’ में जहां भी उन्हें मौका मिला, उन्होंने भारत का सिर गर्व से ऊंचा किया। विरेंद्र डेफ ओलंपिक में कई बार गोल्ड मेडल प्राप्त कर चुका है।