कैंसर बीमारी से बचाव और इलाज के तौर-तरीकों पर काम करने के लिए भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के बीच एक समझौता करने का फैसला लिया गया है।
इस संबंध में भारत और अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच पहली बैठक बृहस्पतिवार को एम्स में हुई। अंतिम फैसला लेने से पूर्व दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच दुबारा बैठक हो सकती है।
बैठक में अमेरिका के एनसीआई के प्रमुख डॉ. हेराल्ड वार्मस व उनकी टीम, एम्स निदेशक डॉ. एम.सी.मिश्रा, एम्स कैंसर विभाग के प्रमुख डॉ. जी.के.रथ व एम्स के अन्य चिकित्सक मौजूद थे।
दिल्ली एम्स के अंतर्गत हरियाणा के झज्जर में बन रहे नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के साथ अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट ने कैंसर बीमारी से लड़ने के लिए एक साथ मिलकर काम करने का फैसला लिया है।
दोनों देश फिलहाल सर्विक्स (बच्चेदानी के मुंह का कैंसर), फेफड़ा और और गॉल ब्लाडर के कैंसर से बचाव और इलाज के लिए साथ काम करने का निर्णय लिया है। हालांकि साथ-साथ काम करने का औपचारिक ऐलान बाद में होगा।
एम्स के डीन व वरिष्ठ कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. पी.के.जुल्का ने बताया कि भारत में सर्विक्स, माउथ और नेक के साथ-साथ गॉल ब्लाडर के कैंसर मरीजों की संख्या ज्यादा है।
लिहाजा फिलहाल तीन तरह के कैंसर पर एक साथ काम करने का फैसला लिया गया है। बीमारी के कारण और इलाज पर दोनों पर साथ मिलकर शोध कार्य किये जायेंगे। यही नहीं कैंसर बीमारी के इलाज के अत्याधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के लिए भी दोनों देश एक-दूसरे की मदद करेंगे।
हरियाणा के झज्जर में 710 बिस्तरों वाले इंस्टीट्यूट का निर्माण किया जा रहा है। अगले 45 माह में इंस्टीट्यूट को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। निर्माण कार्य पर 2035 करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान है।
एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रति वर्ष 11 लाख कैंसर के नए मरीजों की पहचान होती है जबकि प्रति वर्ष करीब साढ़े पांच लाख कैंसर मरीजों की मौत हो जाती है।
यदि मरीजों की पहचान पहले या दूसरे स्टेज पर हो जाये तो कैंसर से मरने वाले मरीजों की संख्या में काफी कमी लाई जा सकती है।