माई सिटी रिपोर्टर
हिसार। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में बुधवार को दो साल बाद ऑफलाइन दो दिवसीय कृषि मेला लगाया गया। दो साब बाद लगे मेले में इस बार इलेक्ट्रिक कृषि उपकरणों का रुझान ज्यादा देखने को मिला। किसान भी मेले में लगी स्टालों पर इलेक्ट्रिक उपकरणों के बारे में जानकारी लेते नजर आए। इस दौरान कृषि राज यंत्र का मेले में पूरा राज रहा। कृषि राज यंत्र से किसान टिलर, प्लावा, कटिंग ब्लेड, ट्रॉली, बाइक अटैचमेंट कर खेत में विभिन्न तरह के कार्य भी कर सकेंगे। इसके अलावा इस यंत्र का बाइक की तरह भी किसान प्रयोग में ला सकेंगे। मेले में हरियाणा के अलावा पंजाब और राजस्थान के किसान भी पहुंचे। इससे पहले विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर काम्बोज व लुवास के कुलपति प्रो. गुरदियाल सिंह ने मेले का शुभारंभ किया। इस दौरान आयोजित कार्यक्रम में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्र ने (ऑनलाइन) बतौर मुख्य अतिथि किसानों को संबोधित किया।
खेत में काम करने के अलावा बाइक की तरह चला सकेंगे टिलर को
मेले में एक कंपनी द्वारा प्रदर्शित ट्रैक्टर व अन्य उपकरणों को लेकर किसानों ने खासा रुझान दिखाया। कंपनी के अधिकारी ने बताया कि कृषि राज एक मल्टी पर्पज बैटरी चलित इलेक्ट्रिक टिलर है, जो ड्राइविंग और पावर मोड में चलता है। यानी इसे बाइक की तरह 25 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलाया भी जा सकता है और पावर मोड में इससे खेत में भी काम लिया जा सकता है। अधिकारी ने बताया कि टिलर एक तीन फालों का छोटा हल है, जिससे खेत में फसल के बीच काम किया जा सकता है। इसके अलावा प्लाव, कटिंग ब्लेड, बाइक अटैचमेंट, ट्रॉली, अर्थ औगर व जल पंप जैसे उपकरण भी चलाए जा सकते हैं। इन उपकरणों के प्रयोग से किसानों का डीजल बचेगा और मेंटेनेंस का भी खर्च बचेगा।
भविष्य में पानी की कमी के कारण 30 प्रतिशत गिर जाएगा उत्पादन
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्रा ने कहा कि कृषि के लिए जल एक महत्वपूर्ण संसाधन है। जल का उचित प्रबंध न होने से करीब 70 प्रतिशत सिंचाई का जल व्यर्थ बह जाता है। इसलिए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों और विभिन्न फसलों की उन्नत किस्मों को किसान ज्यादा से ज्यादा व्यवहारिक रूप से अपनाएं। मुख्यातिथि ने कहा कि यदि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इसी तरह जारी रहा तो हरियाणा में आने वाले समय में सिंचाई तो दूर की बात, लोगों को पीने के लिए स्वच्छ जल की भारी कमी हो सकती है। इस कारण कृषि उत्पादन में 30 प्रतिशत कमी की संभावना भी है।
उन्नत तकनीक अपनाकर करें पानी का उचित प्रबंध : प्रो. कांबोज
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर काम्बोज ने कहा कि हमें जल संसाधनों का बेहतर प्रयोग, वाटरशेड विकास, वर्षा जल संचय और उन्नत तकनीकों को अपनाकर पानी का उचित प्रबंध करने की अति आवश्यकता है। बूंद-बूंद पानी का सदुपयोग करें और ऐसा करने के लिए भूमिगत पाइप लाइन, टपका सिंचाई और फव्वारा सिंचाई जैसी पद्धतियां अपनाएं। लुवास के कुलपति डॉ. गुरदियाल सिंह ने कहा कि इस मेले का आयोजन किसान हित के लिए बेहद फायदेमंद है। व्यावहारिक रूप से मेले में जो सीखने को मिलता है वह ऑनलाइन माध्यम से संभव नहीं है। कार्यक्रम में ओएसडी डॉ. अतुल ढींगड़ा, कुलसचिव डॉ. राजवीर सिंह, विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. रामनिवास ढांडा, अनुसंधान निदेशक डॉ. एसके सहरावत, गुजवि के कुलसचिव डॉ. अवनीश वर्मा मौजूद रहे।
8 क्विंटल तक ली जा सकेगी मूंग की पैदावार, पीला मौजेक बीमारी प्रतिरोधक है किस्म
- कृषि मेले में प्रदर्शित की गई नई किस्म एमएच 1142
एचएयू में आयोजित कृषि मेले में विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न फसलों की तैयार की गई नई किस्मों को प्रदर्शित किया गया। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मूंग की पुरानी किस्मों की अपेक्षा 8 क्विंटल तक उत्पादन देने वाली एक नई किस्म तैयार की है। एमएच 1142 नामक इस किस्म से भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार औसतन 5 से 8 क्विंटल तक फसल ली जा सकती है। यही नहीं यह फसल पीला मौजेक सहित कई मुख्य बीमारियों के रोग प्रतिरोधी है। इस किस्म को भारत के उत्तर-पश्चिम व उत्तर पूर्व के मैदानी क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम) में खरीफ सीजन के लिए अनुमोदित किया गया है।
ये हैं इस फसल की विशेषताएं
- 63 से 70 दिनों में पककर हो जाती है तैयार।
- जुलाई के पहले पखवाड़े में लगाना रहता है उपयुक्त।
- इसका पौधा कम फैलावदार सीधा एवं सीमित बढ़वार वाला होता है, जिसकी कटाई आसान है।
- इसकी फलियां काले रंग की व बीज मध्यम आकार के हरे व चमकीले होते हैं।
- यह किस्म पीला मौजेक, पत्ता झूरी, पत्ता मरोड़ जैसे विषाणु रोगों के प्रतिरोधी है।