हिसार। हिंदी हमारी मातृभाषा है और हमें इसे बोलने व लिखने में कभी भी नहीं झिझकना चाहिए। हिंदी के प्रोत्साहन के लिए यह भी जरूरी है कि तकनीकी और विज्ञान जैसे अंग्रेजी भाषा प्रधान विषयों का हिंदी में अनुवाद होना चाहिए। अमुनन शिक्षक अंग्रेजी भाषा में लिखे गए विज्ञान जैसे विषयों को भी हिंदी में ही पढ़ाते हैं, ताकि विद्यार्थियों को उन विषयों को समझने में आसानी हो। ऐसे में विज्ञान एवं तकनीक के विषयों का हिंदी में सरल अनुवाद होना चाहिए।
प्राकृतिक रुप से इंसान के विकास में उसकी मातृभाषा का विशेष महत्व होता है। किसी पर भी जबरन अन्य भाषा नहीं थोपी जानी चाहिए। हम हिंदुस्तानी हैं तो स्वाभाविक तौर पर हम मातृभाषा हिंदी में ही अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से कह पाते हैं। मातृभाषा से रचनात्मकता में निखार आता है। इसलिए जरूरी है कि हिंदी को प्रोत्साहन मिले। हमें बेझिझक और गर्व के साथ हिंदी बोलनी चाहिए।
- प्रो. संदीप राणा, महाविद्यालय मामलों के अधिष्ठाता, गुजवि
मुझे लगता है कि हम हिंदी बोलने में संकोच नहीं करते बल्कि यह मजबूरी भी है। हम जब कक्षा में पढ़ाते हैं, तब हिंदी में ही पढ़ाते हैं जबकि विज्ञान के विषय तो अंग्रेजी में हैं। यानी कि बच्चे मातृभाषा में ही किसी भी विषय को आसानी से समझ पाते हैं। इसलिए हिंदी भाषा को प्रोत्साहन देने के लिए यह भी जरूरी है कि विज्ञान एवं तकनीकी के विषयों और उनके शब्दों का भी हिंदी में अनुवाद हो। विज्ञान के हिंदी शब्दकोष को बढ़ाया जाए।
- प्रो. आशीष अग्रवाल, निदेशक, आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन सेल, गुजवि
मुझे लगता है कि हिंदी को प्रोत्साहन देेने के लिए अखबारों को अपनी भूमिका का दायरा बढ़ाना होगा। कई बार कई विषय ऐसे होते हैं, जो आम लोगों के लिए अंग्रेजी में समझना मुश्किल होता है। ऐसे में अखबारों को विश्लेषण करना चाहिए ताकि आम लोग भी उसे हिंदी में समझ सकें। हिंदी का भी सरलीकरण जरूरी है।
- प्रो. हरभजन बंसल, शैक्षणिक मामलों के अधिष्ठाता, गुजवि
देश की अखंडता और एकता को बनाए रखने में हिंदी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिंदी के माध्यम से जिस तरीके से हमारी भावनाएं दूसरों तक पहुंचती हैं। जो भावनाएं हम दूसरों को हिंदी के माध्यम से समझा सकते हैं, वो काम कोई अन्य भाषा नहीं कर सकती। दूसरा, लेखन व कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा। कार्यालयों की अंग्रेजी भाषा हिंदी भाषी लोगों के लिए परेशानी खड़ी करती है।
- प्रो. अतुल ढींगड़ा, अधिष्ठाता, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम, एचएयू