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हम से पूछो कि कहर क्या है, है गुलामी क्या, कैसा लगता है कत्ल होना मां की कोखों में...

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अमर उजाला कार्यालय में पहुंचे कवि, लेखक, साहित्यकार - फोटो : Hisar
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हिसार। हम से पूछो कि कहर क्या है, है गुलामी क्या, कैसा लगता है कत्ल होना मां की कोखों में, कैसा होता है जीना साये में तलवारों के। ग्रामीण लड़कियों की व्यथा पर स्वरचित कविता ‘फकत किस्सा’ से कवयित्री रश्मि बजाज ने साहित्यिक गोष्ठी का आगाज किया।
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अमर उजाला कार्यालय में मंगलवार शाम को अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत आयोजित साहित्यिक गोष्ठी में लेखिकाओं, कवयित्रियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। साहित्यकार कमलेश भारतीय ने गोष्ठी की अध्यक्षता की। दूरदर्शन हिसार के निदेशक डॉ. राजकुमार नाहर विशिष्ट अतिथि के तौर पर पहुंचे। उन्होंने प्रदेश भर के कलाकारों को दूरदर्शन पर मंच देने का एलान  किया। करीब दो घंटे चली गोष्ठी में अंग्रेजी की प्रोफेसर अपर्णा बतरा विशेष तौर पर शामिल हुईं।  
लेखिका रश्मि बजाज ने कहा, वह रामायण मुझको लिखनी, सीता न जहां निर्वासित हो। वह महाभारत मुझको रचनी, जहां द्रौपदी न निर्वस्त्रित हो। मैं वाल्मीकि और व्यास पुत्री, नवगाथा गाने आई हूं। अर्धनारीश्वर की वह कल्पना सत्य कराने आई हूं।
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दूरदर्शन के निदेशक डॉ. राजकुमार नाहर ने सुनाया कि आसान है करना वादों का, वादों का निभाना मुश्किल है। अपने तो सभी कहलाते हैं पहचान में आना मुश्किल है। इस रचना को गीत के अंदाज में बेहद सुरीली आवाज में प्रस्तुत करते हुए सभी का दिल जीत लिया।
कवयित्री कल्पना रहेजा ने मुलतानी में रचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि गिन लो पैैसा, गिन लो प्यार, मैको मेरे यार मोड़ दो, महंगी गाड़ी मेरे किसी काम की नहीं। उनका गीत बचपन के दोस्तों को याद करने पर आधारित था।
नवोदित कवयित्री अनन्या बिश्नोई ने कोए की चोंच में अंगूर कविता से भाव विभोर कर दिया। इसमें शिक्षा और पैसे के महत्व को बताया। उन्होंने अपनी एक कविता अंग्रेजी में भी सुनाई।
साहित्यकार कमलेश भारतीय ने कहा कि अपनी लघुकथा को कविता के अंदाज में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि महिलाओं को सात तालों में कैद रहना पड़ता है। जन्म से लेकर शादीशुदा जीवन तक हर जगह उस पर बंदिशों के ताले हैं।
जीजेयू के प्रोफेसर डॉ. मिहिर रंजन पात्रा ने कहा कि ढेर सारे सामान के साथ मैं खुद को घसीटता हुआ प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंचा। एक लड़की की व्यथा पर आधारित इस रचना ने सभी का ध्यान खींचा। रचना की आखिरी पंक्ति में ही इसका शीर्षक रहा।  
जीजेयू के प्रोफेसर तिलक सेठी ने गजल के माध्यम से वर्तमान हालात से रूबरू कराया। इस कदर माहौल है बदला हुआ, आदमी है आदमी से डरा हुआ। उन्होंने आज के समय में आदमी किस तरह से घिरा हुआ है, वह किस तरह से जीवन को जी रहा है पर विचार रखे।  
कवयित्री अर्चना ठकराल ने कहा कि छोटे बच्चों की खुशी भी छोटी सी होती है। एक मासूम को चंद टाफी, बिस्किट, चिप्स मिलने से वह बेहद खुश हो जाते हैं। अपनी लघुकथा के माध्यम से इसे बेहतरीन ढंग से सुनाते हुए खूब तालियां बटोरी।
कवयित्री रश्मि बिश्नोई ने लड़कियों की मनोदशा पर आधारित कविता सुनाई। आज भी बिकती हैं कांच की रंगीन चूड़ियां, सजाती है कलाइयां, संजोती हैं आंखों में कुछ सपने लड़कियां। कांच की चूड़ियां कब टूट जाती हैं, बड़ा दुख देती हैं चूड़ियां।
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