फर्जी पासपोर्ट मामले में पुलिस की गलत कार्यशैली भी जिम्मेदार है। फर्जी पासपोर्ट मामला बेशक टोहाना से जुड़ा हुआ है। मगर पुलिस के काम करने के तौर तरीके लगभग सभी थानों में एक जैसे हैं। उनमें सबसे बड़ी खामी ये है कि पुलिस ज्यादातर काम थाने में बैठ कर करती है। एड्रेस वेरिफिकेशन का कार्य भी इसी ढंग से किया जाता है।
पासपोर्ट मामलों में ऐसी लापरवाह कार्यशैली राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे से कम नहीं है। कायदे से मौके का मुआयना करना होता है। प्रक्रिया मुताबिक किसी व्यक्ति के पते की वेरिफिकेशन के लिए पुलिस कर्मचारी मौके पर जाएगा। वह पता करेगा कि संबंधित व्यक्ति उपरोक्त पते पर रहता है या नहीं। इसके लिए पड़ोसियों से पूछताछ की जाती है। पड़ोसियों के नाम व मोबाइल नंबर दर्ज किए जाते हैं। इसके अलावा गांव या शहर के किसी मौजिज व्यक्ति की भी रिपोर्ट ली जाती है। वह तस्दीक करता है कि आवेदक को वह निजी तौर पर जानता है और आवेदक द्वारा लिखित नाम व पता सही है। जब संबंधित पुलिस कर्मचारी को तसल्ली हो जाती है, तब एड्रेस वेरिफिकेशन की रिपोर्ट लिखी जाती है। यदि कोई व्यक्ति के दो पते हैं और अस्थायी तौर पर कहीं और रहता है, तो भी पुलिस कर्मचारी को रिपोर्ट में लिखना होता है। यानी पुलिस को वास्तविक स्थिति बतानी होती है। मगर आमतौर पर पुलिस मौके पर नहीं जाती। मोहल्ले में जाकर पड़ताल नहीं करती। हालांकि पुलिस का तर्क है कि समय का अभाव रहता है। इसलिए मौके पर जाना मुश्किल होता है और थाने में बैठकर प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है।
ऐसे वेरिफिकेशन करती है पुलिस
आवेदक एंबेसी में पासपोर्ट के लिए आवेदन करते हैं। उसमें नाम व स्थायी पता दर्ज होता है। चूंकि पासपोर्ट संबंधी कार्य राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा होता है। एंबेसी यह पड़ताल करती है कि आवेदक वास्तव में कौन है और कहां रहता है। इसलिए एंबेसी संबंधित थाना से आवेदक की वेरिफिकेशन मांगती है। फाइल आते ही पुलिस आवेदक को फोन करती है। उसे कहा जाता है कि तुम अपने दस्तावेज, एक पड़ोसी व गांव के किसी जनप्रतिनिधि या नंबरदार को साथ लेकर थाने में आ जाना है। उस स्थिति में आवेदक शातिर हो तो वह फर्जी गवाह और फर्जी पंच साथ ले जाकर रिपोर्ट करवा सकता है। थानों में पुलिस कर्मचारी अकसर बदलते रहते हैं। ऐसे में पुलिस कर्मचारी निजी तौर पर सभी को जानता हो, यह जरूरी नहीं है।
पूर्व सांसद अशोक तंवर ने किया ट्वीट
फर्जी पासपोर्ट को लेकर अमर उजाला में प्रकाशित खबर को कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष एवं अपना भारत मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अशोक तंवर ने सोशल मीडिया पर शेयर किया है। उन्होंने खबर को ट्वीट करते हुए मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मामले में संज्ञान लेने की मांग की है। उन्होंने लिखा है कि हरियाणा में फर्जीवाड़े के जिस तरह के मामले उजागर हो रहे हैं, उसकी कोई दूसरी मिसाल शायद ही कहीं और देखने को मिलेगी।
कोट
पुलिस कर्मचारी को सुनिश्चित करना चाहिए कि वेरिफिकेशन बिल्कुल सही हो। हालांकि, यह अनिवार्य नहीं है कि कर्मचारी हर पासपोर्ट मामले में मौके पर जाकर पड़ताल करे। जहां कुछ संदेहजनक हो, वहां गहन पड़ताल करनी चाहिए। पासपोर्ट विभाग ही पड़ताल का स्तर तय करता है।
-राजेश कुमार, पुलिस अधीक्षक, फतेहाबाद।
कोट
किसी आपराधिक मामले की जांच हो या एड्रेस वेरिफिकेशन, पुलिस का कानूनी दायित्व बनता है कि वह मौके पर जाए और तथ्यों की पड़ताल करे। वेरिफिकेशन का मतलब की पड़ताल करना है, जानकारी की पुष्टि करना है। यदि इस काम में फर्जीवाड़ा हो जाए तो वेरिफिकेशन का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
-राजेंद्र कुकरेजा, पूर्व जिला न्यायवादी।