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यूं ही नहीं खराब हुई हवा, पूरा सिस्टम जिम्मेदार

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गांव कुलां में शनिवार शाम को खेत की पराली में लगाई गई आग। - फोटो : Fatehabad
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फतेहाबाद। जिले में पराली जलाने के कारण खराब हुई हवा के लिए अकेले किसान ही नहीं बल्कि पूरा सिस्टम जिम्मेदार है। सोसायटियां बनाने के बाद भी छोटे किसानों को कृषि यंत्रों का लाभ नहीं मिल पाता है। सोसायटी बनाने के बाद 25 लाख रुपये तक के कृषि यंत्र खरीदने पड़ते हैं। बेशक सब्सिडी 80 फीसदी तक मिलती है, लेकिन छोटे किसानों के पास इतने पैसे जुटाने का सामर्थ्य ही नहीं है।
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दूसरी तरफ गांठें बनाने वाले बेलर्स के पास स्टॉक करने के लिए ही पर्याप्त जगह नहीं है। पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पूरा होने के कारण पंचायती जगह भी उन्हें नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा किसान आंदोलन के कारण भी सरकार के खिलाफ किसानों में नाराजगी है। इस नाराजगी को भी पराली जलाकर दर्शाने की कोशिश हो रही है। इस बार किसानों द्वारा पराली की गांठें भी कम बनवाई गई हैं। जिला प्रशासन ने 200 सोसायटियों को कृषि यंत्र उपलब्ध करवाए हैं। मगर इन कृषि यंत्रों का छोटे किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है। बेलर्स के पास भी अभी तक सिर्फ 30 फीसदी गांठें बनाने का काम हुआ है जबकि पिछली बार यह आंकड़ा 90 प्रतिशत तक था।
एक ही प्लांट भूना में, उस पर भी विश्वास नहीं
बेलर्स की मानें तो पराली की गांठों को बेचने के लिए भूना में सिर्फ एक ही प्लांट हैं। पिछले साल इस प्लांट में गांठें बेचने पर बेलर्स को पैसा करीब एक साल बाद मिला था जबकि प्रशासन व प्लांट अधिकारियों का दावा था कि नकद भुगतान होगा। इस कारण इस बार बेलर्स प्लांट में पराली भेजने में कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं। कुछ बेलर्स ने तो अपने स्तर पर ही गांठों का स्टॉक किया हुआ है।
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ये भी हैं कुछ कारण
1. कृषि यंत्र देने में समानता नहीं
गांव भिरडाना के किसान विजय कुमार बताते हैं कि प्रशासन कृषि यंत्र उपलब्ध करवाने के बड़े-बड़े दावे तो करता है, लेकिन इसका लाभ छोटे किसानों को नहीं मिल पाता है। सोसायटी बनाने पर 25 लाख रुपये तक के कृषि यंत्र खरीदे जाते हैं। इतना पैसा छोटे किसान एकत्रित नहीं कर पाते हैं।
2. बासमती किस्म के अवशेष मिट्टी में नहीं मिलते
गांव मूसाखेड़ा के किसान गौरव सिंह कहते हैं कि प्रशासन लाख दावे करें लेकिन बासमती किस्म की धान के अवशेष मिट्टी में नहीं मिल पाते हैं। अगर अधिकारी चाहें तो उनके सामने डेमो करके दिखा सकते हैं। इस कारण आग लगाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है।
3. ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा ज्यादा
रतिया के किसान मनदीप सिंह कहते हैं कि गांठें बनाने के लिए प्रशासन कह तो रहा है, लेकिन डीजल महंगा होने के कारण इसमें खर्चा बहुत लगता है। सुपरसीडर से गेहूं की बिजाई करवाने पर 2500 रुपये प्रति एकड़ से ज्यादा खर्च होते हैं। इतना किसान खर्चा करेगा तो उसको आमदनी क्या होगी।
4. पोर्टल का सर्वर भी रह जाता है डाउन
किसानों की एक परेशानी यह भी है कि पराली की गांठें बनवाने के लिए अगर एक हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि लेनी है, तो उन्हें पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना पड़ता है। मगर पोर्टल का सर्वर भी कई बार डाउन रहता है। किसान पूरी तरह तकनीक को लेकर जागरूक नहीं है, इस कारण भी काफी किसान ऑनलाइन आवेदन ही नहीं कर पाते हैं।
5. गोशाला कमेटियां भी नहीं ले रही गांठें
एक बड़ा कारण यह भी है कि गोशाला कमेटियां भी पराली की गांठें मंगवाने में ज्यादा रुचि नहीं लेती हैं। गोशाला कमेटियों का कहना होता है कि अगर कोई गोशाला तक गांठें छोड़ जाएगा तो रखवा ली जाएंगी। गांठें लाने के लिए वाहन भेजने में वह समर्थ नहीं है। मगर किसान खेत से गोशाला तक पराली भिजवाएं तो डीजल महंगा होने के कारण उनका भी काफी खर्च लगता है।
कोट
पिछली बार की अपेक्षा इस बार किसान बेहद कम पराली की गांठें बनवा रहे हैं। हमने अभी तक सिर्फ 300 एकड़ की पराली की गांठें बनाई हैं जबकि पिछले साल यह आंकड़ा बहुत ज्यादा था। अधिकारियों को भी गंभीरता दिखानी होगी।
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मोहन सिंह, प्रधान, बेलर्स एसोसिएशन
संवाददाता के सवाल का डीसी महावीर कौशिक ने दिया जवाब
सवाल : तीन-चार दिन से पराली जलाने के मामले बढ़ गए हैं, क्या कारण रहा।
जवाब : किसान प्रशासन की बात मान रहे हैं। पिछली बार 5 नवंबर तक 950 केस थे, अबकी बार 690 हैं। 40 फीसदी तक केस कम हुए हैं।
सवाल : आपको भी फील्ड में उतरना पड़ रहा है।
जवाब : गांव स्तर की कमेटियां थोड़ी सुस्त रही होंगी। इसलिए उनको मोटिवेट करने के लिए मैंने बैठकें ली हैं।
सवाल : किसान आंदोलन का भी असर है क्या?
जवाब : थोड़ा बहुत असर हो सकता है। बाकी हमने कहा है कि निगरानी करना व पराली जलाने से रोकना सरकारी काम है, इसको करना तो पड़ेगा।
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