हरियाणा के फतेहाबाद जिले में एक के बाद एक फर्जी पासपोर्ट के कई मामले सामने आ चुके हैं। हालांकि इसके लिए पुलिस की गैर-जिम्मेदाराना वेरिफिकेशन प्रक्रिया को प्रमुख कारण माना जा रहा है। पुलिस को ऑनलाइन मोड में दस्तावेज बदलने की प्रक्रिया भी चुनौती बनी हुई है। आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के हैंडलर रवि उर्फ नोनू के फर्जी पासपोर्ट का मामला सामने आने से पूर्व टोहाना में फर्जी पासपोर्ट के मामलों में दर्ज एफआईआर की जांच कर रही एसआईटी की जांच में स्पष्ट हो चुका है कि जिले में बने फर्जी पासपोर्ट बनने के मामलों में या तो वेरिफिकेशन के लिए गवाहों को थाने में बुलाकर खानापूर्ति की गई अथवा पुलिस ने भरोसेमंद लोगों पर विश्वास कर रिपोर्ट बनाकर भेज दी।
एडवोकेट विनय शर्मा बताते हैं कि पासपोर्ट ही नहीं किसी भी कार्य के लिए वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को संबंधित थाने के पुलिसकर्मी को मौके पर पहुंचकर आसपास के लोगों से संबंधित व्यक्ति के बारे में पड़ताल कर रिपोर्ट बनानी होती है लेकिन राज्य में पुलिस मौके पर पहुंचने के स्थान पर आवेदक को फोन कर अपनी मर्जी से अपने साथ दो गवाह के पहचान पत्र लाने के लिए कह देती है। यही सबसे बड़ी लापरवाही फर्जीवाड़े को जन्म देती है।
नाम न छापने की शर्त पर एक पासपोर्ट एजेंट ने बताया कि पहले पासपोर्ट का आवेदन ऑफलाइन होता था। ऐसे में कई जरूरी दस्तावेजों की मौके पर ही जांच हो जाती थी। हालांकि अब ऑनलाइन प्रक्रिया में दस्तावेज स्कैन कर अपलोड कर दिए जाते हैं। इसके बाद पुलिस के पास वेरिफिकेशन के लिए पत्र जाता है। पुलिस किसी दस्तावेज की जांच न कर आवेदक को खुद ही थाने बुलाकर वेरिफिकेशन रिपोर्ट भेज देती है।
ऑनलाइन प्रक्रिया में सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण बात यह भी है कि आधार कार्ड जैसे आईडी प्रूफ में समय-समय पर बदलाव करवाने का प्रावधान है। इसके अलावा कई लोग खुद ही दस्तावेज पर अपना नाम बदलकर वेरिफिकेशन को प्रभावित करने में कामयाब हो जाते हैं।
आतंकी संगठन के हैंडलर रवि उर्फ नोनू के सदर थाना क्षेत्र के गांव अहरवां के पते पर बने फर्जी पासपोर्ट की वेरिफिकेशन में लापरवाही की जांच भी पुलिस कर रही है। पिछले वर्ष 2021 में फर्जी पासपोर्ट का मामला सामने आने पर किस पुलिस अधिकारी ने दस्तावेजों की जांच कैसे की? और जांच में क्या लापरवाही बरती? इसे भी जांच में शामिल किया जा रहा है।