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गली के बजाय हाईवे पर खुलने वाले गेट का प्रयोग करता था नरेश

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चरखी दादरी। नकली सिक्के तैयार करने के सरगना नरेश ने इमलोटा में जगह का चयन काफी सोच-समझकर किया था। अहम बात यह है कि बंद पड़ी जिस वाटिका में नकली सिक्के बनाने का खेल चल रहा था, उसका एक गेट एनएच-334 बी पर खुलता है जबकि दूसरा गेट गांव की एक गली में खुलता है। संवाददाता की पड़ताल में सामने आया कि नरेश कच्चा माल लाने और सिक्के ले जाने के लिए एनएच की तरफ खुलने वाला गेट ही प्रयोग करता था। इतना ही नहीं, यहां उसका आवागमन भी रात के समय होता था।
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दरअसल जिस जगह को किराये पर लेकर नरेश नकली सिक्के तैयार करता था, वहां करीब आठ साल पहले जगह के मालिक जगबीर ने वाटिका बनवाई थी। शुरुआत के दो सालों में ही यहां चार शादियों की बुकिंग हुई जबकि पिछले छह सालों से यहां कोई शादी नहीं हुई। यहां काफी अधिक जगह है और इसके मद्देनजर ही नरेश ने यहां नकली सिक्के तैयार करने की योजना बनाई।
अपनी योजना को परवान चढ़ाने के लिए नरेश गत 25 मार्च को ही वाटिका की चाबी जगबीर के घर से ले आया था, जबकि एग्रीमेंट नौ अप्रैल को बनवाया गया। जगबीर और नरेश की जान-पहचान कैसे हुई, इसे लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। वहीं, जगह के मालिक जगबीर के बेटे संजय ने बताया कि इस बारे में तो उसके पिता ही कुछ बता सकते हैं। संजय ने बताया कि 22 अप्रैल के बाद से परिवार के किसी सदस्य का जगबीर से संपर्क नहीं हुआ है, जबकि चार दिन पहले उसकी चचेरी बहन की मौत हुई है और इससे परिवार टूटा हुआ है। संजय ने बताया कि उसकी चचेरी बहन की तबीयत पिछले करीब एक माह से खराब चल रही थी और परिवार वाले उसके उपचार में ही उलझे हुए थे। इसके चलते ही वो जगह को नहीं संभाल पाए। संजय ने बताया कि उन्हें भनक तक नहीं थी कि नरेश उनकी जगह पर नकली सिक्के तैयार करने का अवैध कारोबार करेगा।
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- वाटिका का गेट खोलते थे बहुत कम
संवाददाता ने जब इमलोटा के ग्रामीणों से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि वाटिका का गेट खोला ही बहुत कम जाता था। यहां तक कि वाटिका के बाहर दुकान करने वाला अगर कोई व्यक्ति अंदर जाने का प्रयास करता तो उसे प्रवेश तक नहीं करने दिया जाता था। वाटिका के समीप रहने वाले एक ग्रामीण ने बताया कि रात के समय ही एक कार यहां आती थी जो मुख्य सड़क के साथ लगते गेट से अंदर दाखिल होती थी और उसी रास्ते से वापस जाती थी।
- चौकी से वाटिका पहुंचने में लगता है पांच मिनट का समय -
एनएच-334 बी पर ही इमलोटा के बाहरी क्षेत्र में पुलिस चौकी है। इस चौकी की दूरी वाटिका वाली जगह से करीब डेढ़ किलोमीटर है। खास बात यह है कि इसके समीप ही स्थित बिगोवा मोड़ पर कई दफा पुलिस नाकाबंदी भी करती है और यह जगह वाटिका से महज 50 कदम दूर है।
- ग्रामीण बोले: न मशीनों की आवाज सुनती थी, न अंदर का माजरा पता चलता था -
संवाददाता से बातचीत में वाटिका के समीप ही रहने वाले कुछ लोगों ने बताया कि उनके घरों में मशीनें चलने संबंधी कोई आवाज सुनाई नहीं देती थी। इतना ही नहीं किराये पर वाटिका की जगह लेने के बाद यहां लोगों की चहल-पहल भी कम रहती थी। उन्हें तो यह तक नहीं पता था कि अंदर क्या काम किया जा रहा है।
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