भिवानी। नहरों में अड़ंगा (झाड़, झंकाड़ और मिट्टी) की वजह से पानी के बहाव में अड़चन आ रही है। यही वजह है कि जून में नहरों में पानी मिलने के बावजूद भी जिले के 70 फीसदी टैंक खाली ही रह गए हैं। जिले की करीब 12 लाख की आबादी के लिए भी गंभीर पेयजल संकट के हालात बने हैं। पहाड़ों में बारिश नहीं होने की वजह से यमुना नदी में भी जलस्तर काफी नीचे गिर गया है। भांखड़ा में भी पर्याप्त पानी नहीं बचा है. जिसकी वजह से भिवानी में नहरों की टेल भी सूखी रह गई है।
18 से 25 जून तक जिले को नहरी पानी मिला, मगर 2150 क्यूसेक डिमांड के मुकाबले शुरुआत के पांच दिन तो नहरों में औसतन 600 क्यूसेक पानी ही चला, जिसकी वजह से न टैंक भर पाए और न नहरों की टेल तक पानी पहुंचा। सुंदर और मिताथल फीडर में पानी चलाने के लिए तीन दिन तक जूई नहर में पानी बंद रखना पड़ा। शहरी जलघर के टैंकों की हालत भी पतली है, क्योंकि इन्हें भर पाना भी मुश्किल हो गया। सिंचाई विभाग की नहरों की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार भले ही दावे पर दावे करती रहे, मगर वास्तव में नहरी पानी को लेकर जिले में क्या हालात हैं यह किसी से छीपे नहीं हैं।
सुंदर ग्रुप के साथ जूई और मिताथल फीडर नहर में 2150 क्यूसेक पानी की डिमांड रखी गई थी। ये डिमांड पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए थी, न की किसानों को खेतों की सिंचाई के लिए, मगर किसान तो नहरी पानी से मायूस हुए ही, इसी के साथ टैंकों तक पानी पहुंचने की मुराद भी पूरी नहीं हुई। क्योंकि सिंचाई विभाग के अधिकारियों की लाख कोशिशों के बावजूद पहले पांच दिनों तक औसतन 600 क्यूसेक पानी ही चला। पहले से ही मिट्टी और अड़ंगे से अटी पड़ी नहरों में कम पानी होने की वजह से पर्याप्त बहाव भी नहीं बना।
जिले में 272 गांवों के अधिकतर पानी के टैंक 30 से 40 फीसदी तक ही भर पाए, जबकि टेल के गांवों में तो पानी के टैंक गिले भी नहीं हुए। सिंचाई विभाग के अधिकारियों की चिंता भी इसलिए बढ़ गई हैं। क्योंकि यमुना और भांखड़ा ही जिले में नहरी पानी की आपूर्ति के बड़े स्त्रोत हैं, अगर इनसे भी पर्याप्त पानी नहीं मिला तो फिर गंभीर पेयजल संकट से कोई निजात नहीं दिला सकता है। सिंचाई विभाग की उम्मीद भी अब मानसून की दस्तक से ही है। अगर बारिश हुई तो नदी में बेहतर जलस्तर बनेगा, जिससे अतिरिक्त पानी भी नहरों में मिलने की उम्मीद है।
नहरों में नहीं पानी का पर्याप्त बहाव, किनारों में भी बने कटाव
नहरों में झाड़ झंकाड़ उगे हैं, जिनकी मानसून की दस्तक से पहले कोई साफ सफाई भी नहीं कराई गई हैं। कई बड़ी नहरों की हालत ऐसी हैं, जहां पानी के बहाव के साथ ही काफी कूड़ा भी नहरों के रास्ते पहुंच गया है, जिसे निकालना बहुत जरूरी है। ये कूड़ा पानी के बहाव को भी बाधित कर रहा है, जबकि किनारों में कटाव भी बने हैं। मानसून के बाद जब नदी में उफान आता है तो अतिरिक्त पानी भी नहरों में छोड़ा जाता है। अचानक छोड़े गए इस पानी की वजह से नहर टूटने की भी हर साल घटनाएं हो रही हैं। इनमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाले गांव धनाना व बवानीखेड़ा क्षेत्र के गांव हैं। जहां सेम का इलाका भी हैं वहीं पानी निकासी के भी उचित प्रबंध तक नहीं है। जिसकी वजह से किसानों की खड़ी फसलों में भी काफी नुकसान होता है।
मनरेगा में भी नहीं लग रहा मजदूरों का मन
नहरों की सफाई का काम मनरेगा से ही कराए जाने का प्रावधान है। इसके लिए सिंचाई विभाग के अधिकारी संबंधित नहरों के एस्टीमेट बनाकर डीआरडीए को देते हैं, जिसके बाद नहरों की सफाई का काम मनरेगा से कराया जाता हैं, मगर पिछले काफी अर्से से मनरेगा में मजदूरों का मन भी नहीं लग रहा है। इसकी वजह अधिकारियों द्वारा मनरेगा में काम देने व भुगतान की नीति में खामियां बताई जा रही हैं। यही वजह है कि ये योजना भी गरीबों को रोजगार देने में विफल हो रही है।
वर्जन:::
यमुना नदी में पानी की स्थिति काफी कम है और भांखड़ा में भी पानी नहीं है। इसी वजह से जिले में नहरी पानी को लेकर हालात बहुत नाजुक हैं। इस बार 2150 क्यूसेक डिमांड के अनुसार पहले पांच दिन तो औसतन 600 क्यूसेक पानी मिला है। सुंदर और मिताथल में पानी चलाने के लिए जूई नहर में भी तीन दिन तक पानी बंद रखना पड़ा। अब बारिश से ही उम्मीद है। लगातार उच्चाधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा चल रही है। हमारी प्राथमिकता वाटर टैंकों को भरने की है।
-राहुल शर्मा, कार्यकारी अभियंता, जूई वाटर सर्विसेज, सिंचाई विभाग भिवानी।