जो पुण्य सूर्यग्रहण में दान से होता है, उससे कई गुना अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से होता है। जो पुण्य गौ-दान सुवर्ण-दान अश्वमेध यज्ञ से होता है, उससे अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से होता है। उपरोक्त शब्द अंबाला शहर के ज्योतषि टीआर मैत्रेय ने कहे।
इस मौके पर उन्होंने एकादशी व्रत की संपूर्ण जानकारी देते हुए कहा कि एकादशी व्रत करने वालों के पितर नीच योनि से मुक्त होते हैं और अपने परिवार वालों पर प्रसन्नता बरसाते हैं। इसलिए यह व्रत करने वालों के घर में सुख-शांति बनी रहती है। धन-धान्य, पुत्रादि की वृद्धि होती है। कीर्ति बढ़ती है, श्रद्धा-भक्ति बढ़ती है, जिससे जीवन रसमय बनता है। परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त होती है। पूर्वकाल में राजा नहुष, अंबरीष, राजा गांधी आदि जिन्होंने भी एकादशी का व्रत किया, उन्हें इस पृथ्वी का समस्त ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। भगवान शिवजी ने नारद से कहा है कि एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमे कोई संदेह नहीं है। एकादशी के दिन किए हुए व्रत गोदान आदि का अनंत गुना पुण्य प्राप्त होता है। एकादशी को दिया जलाकर विष्णु सहस्त्र नाम पढ़ें। विष्णु सहस्त्र नाम नहीं हो तो 11 माला गुरुमंत्र का जप करलें। अगर घर में झगडे होते हों, तो झगड़े शांत हो जाएं, ऐसा संकल्प करके विष्णु सहस्त्र नाम पढ़ें तो घर के झगड़े भी शांत होंगे और भगवान विष्णु की अनुकृपा भी बरसेगी। प्रत्येक महीने में 15-15 दिन में एकादशी आती है। एकादशी का व्रत पाप और रोगों को स्वाहा कर देता है, लेकिन वृद्ध, बालक और बीमार व्यक्ति एकादशी न रख सके तो वह चावल का त्याग करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि एकादशी के दिन जो चावल खाता है तो उसे एक-एक चावल एक-एक कीड़ा खाने के बराबर का पाप लगता है।