दरअसल थनेला रोग जीवाणुओं के द्वारा होता है, हालांकि विषाणु, कवक, माइको प्लाज्मा इत्यादि भी यह रोग उत्पन्न करते हैं। ऐसे में अगर एक ही प्रकार की दवा पशु को दी जाए तो जीवाणु उस दवा को लेकर अपने भीतर प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। ऐसे में दवा असर नहीं करती और पशु का थन खत्म हो जाता है।
दो प्रकार का होता है थनेला रोग
थनेला रोग दो प्रकार का होता है, जिसमें लक्षण और बिना लक्षण के रोग शामिल हैं। लक्षण वाले रोग के दौरान पशु के थनों में सूजन आना, दूध में रेशे आना, दूध का स्वाद बदलना, पानी जैसा दूध आने लगता है। वहीं बिना लक्षण वाले पशुओं में लैब में जांच कराने पर ही रोग की पुष्टि होती है। इसको लेकर उपचार में देरी हुई तो पशुपालक को नुकसान उठाना पड़ सकता है।