इस पुल का नाम लॉर्ड एल्गिरन के नाम पर रखा गया था, जो वायसराय थे। रेलवे के अधिकारियों ने पुल को बनाने के पहले दो साल तक सर्वे किया। सूखे क्षेत्र को चिह्नित किया गया। फिर घाघरा नदी पर 3695 फीट लंबे पुल को तैयार किया गया, जिसकी लागत उस दौरान 30.75 लाख रुपये आई थी। 61 मीटर लंबाई में 17 गर्डर लगाए गए। सुरक्षा की दृष्टि से 1966-67 में गर्डर को फिर बदल दिया गया।
एलाइनमेंट नहीं मिलने पर पांच किमी पहले जगह देखा
चौका नदी और घाघरा पर ब्रिज को बनाना था। रेल लाइन के लिए सर्वे किया गया। दोनों नदियों के बीच लाइन का एलाइनमेंट नहीं मिल रहा था। इसके बाद इंजीनियरों की टीम ने सर्वे कर देखा तो पांच किलोमीटर पहले ब्रिज के लिए एलाइनमेंट मिल गया। इसके बाद अधिकारियों ने ब्रिज बनाने का निर्णय लिया।
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मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पंकज कुमार सिंह ने कहा कि छोटी लाइन बुक को एक कॉफी टेबल बुक के रूप में लाया जा रहा है। इसमें पूर्वोत्तर रेलवे के 150 वर्षों में आए बदलाव की कहानी है। नए वर्ष में इसका विमोचन किया जाएगा। इसका नार्मल बुक स्वरूप भी तैयार किया जाएगा। यह ना सिर्फ रेलवे के लोगों के लिए बल्कि स्टूडेंट्स, इतिहासकार, रेल फैन सभी के लिए उपयोगी है। बुक लिखने के लिए अध्ययन के दौरान कई रोचक बातें सामने आईं, जिनका जिक्र इस बुक में है। उन्हीं में से एक यह रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी भी है। ब्रिज- द इंजीनियरिंग दैट कनेक्ट इंडिया नाम के चैप्टर में इसका विवरण है।