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आध्यात्म और मनोरंजन का अनूठा संगम है 'प्रेम पोखरा', 61 साल पहले हुआ था निमार्ण

Mon, 01 Jun 2020 12:37 PM IST
vivek shukla प्रदीप अग्रहरि फरेंदा।
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Prem pokhra - फोटो : अमर उजाला।
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महराजगंज के स्थानीय कस्बे में प्रेम पोखरा अत्यंत ही मनोरम स्थल है। यहां आध्यात्म की ज्ञान गंगा में डूबकी लगाने के साथ मनोरंजन के साधन भी हैं। यहां पहुंचकर प्राकृतिक वातावरण में रहने का अवसर में मिलेगा। साथ ही पोखरे में उछलती हुई मछलियों को भी देखा जा सकता है। इन दिनों यह आम लोगों के लिए बंद है।

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फरेंदा कस्बे के प्रेम चंद सर्राफ ने इसे वर्ष 1959 में बनाया था। करीब 42 साल की उम्र में प्रेम चंद सर्राफ इस पोखरे को बनवाने के लिए सोचा तो उस वक्त उन्हें सेठ आनंदराम जयपुरिया इंटर कॉलेज के प्रवक्ता मथुरा मणि शास्त्री ने हौसला बढ़ाया। तीन एकड़ में बने इस प्रेम पोखरे के प्राकृतिक सौंदर्य को देख हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है।

कस्बे के बुजुर्ग बताते हैं कि जब यह पोखर बन रहा था तो तमाम लोगों ने श्रमदान भी किया था। समाज के हर वर्ग के लोगों ने श्रम दान किया था। वर्ष 1994 में प्रेम चंद सर्राफ के निधन के बाद इसकी देखरेख उनके घर के लोग करने लगे। इसकी बेहतरी के लिए हर संभव कोशिश की गई।

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वाटिका में लगे विभिन्न पौधे

हरिप्रसाद सर्राफ बताते हैं कि पिता जी ने इसे मन से बनाया था। उनकी आध्यात्मिक सोच का नमूना इस प्रेम पोखरे पर देखने को मिलता है। पहले इसे राधाकृष्ण वाटिका मंदिर के नाम से जाना जाता था। लेकिन अब इसे प्रेम पोखरे के नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में यहां आम लोगों का आना बंद है।

प्रेम पोखरे पर बने बाटिका में रूद्राक्ष का पौधा लगाया गया है। इसके अलावा अमरूद, संतरा, लीची, चिकु, आम, खरीनी का पौधा भी लगा है। अंदर बैठने के लिए बेंच लगा है। पोखरे में फब्बार लगा है। रात में समय में रंग विरंगी लाइट के बीच फब्बारे अच्छे लगते हैं।

फूलपत्ती से सजी है वाटिका
प्रेम पोखरा परिसर में फूलवारी भी लगी है। जहां तमाम तरह की फूल पत्तियां भी लगी है। मंदिर भी बना है। इसके अलावा एक धर्मशाला भी है। परिसर में राधाकृष्ण एवं भगवान शिव का मूर्ति लगी है।
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