महराजगंज के स्थानीय कस्बे में प्रेम पोखरा अत्यंत ही मनोरम स्थल है। यहां आध्यात्म की ज्ञान गंगा में डूबकी लगाने के साथ मनोरंजन के साधन भी हैं। यहां पहुंचकर प्राकृतिक वातावरण में रहने का अवसर में मिलेगा। साथ ही पोखरे में उछलती हुई मछलियों को भी देखा जा सकता है। इन दिनों यह आम लोगों के लिए बंद है।
फरेंदा कस्बे के प्रेम चंद सर्राफ ने इसे वर्ष 1959 में बनाया था। करीब 42 साल की उम्र में प्रेम चंद सर्राफ इस पोखरे को बनवाने के लिए सोचा तो उस वक्त उन्हें सेठ आनंदराम जयपुरिया इंटर कॉलेज के प्रवक्ता मथुरा मणि शास्त्री ने हौसला बढ़ाया। तीन एकड़ में बने इस प्रेम पोखरे के प्राकृतिक सौंदर्य को देख हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है।
कस्बे के बुजुर्ग बताते हैं कि जब यह पोखर बन रहा था तो तमाम लोगों ने श्रमदान भी किया था। समाज के हर वर्ग के लोगों ने श्रम दान किया था। वर्ष 1994 में प्रेम चंद सर्राफ के निधन के बाद इसकी देखरेख उनके घर के लोग करने लगे। इसकी बेहतरी के लिए हर संभव कोशिश की गई।