बताया जाता है कि ठेके के माध्यम से बड़ी आसानी से पैसा कमाया जा सकता था। हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही दोनों ने अपने-अपने गुट को मजबूत करना शुरू कर दिया। इटली के माफियाओं की तर्ज पर गैंग बना लिए गए। दोनों माफियाओं के बीच जारी वर्चस्व की जंग में पूरा शहर हिल गया था।
मंडल के चार जिलों में कहीं न कहीं रोज गैंगवार में निकली गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी। आए दिन दोनों तरफ के कुछ लोग मारे जाते थे। कई निर्दोष लोग भी मरते थे। इसी दौरान लखनऊ और गोरखपुर विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके युवा विधायक रविंद्र सिंह की भी हत्या हो गई।
कहते हैं कि इसके बाद ठाकुरों के गुट ने वीरेंद्र प्रताप शाही को अपना नेता मान लिया। गोरखपुर माफियाराज से पूरी तरह रूबरू हो चुका था। सरकारी सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका था। प्रदेश की राजधानी में इन दोनों गुटों ने अपनी-अपनी एक समानांतर सरकार बना ली थी। दरबार लगने लगे। जमीनों के मुद्दे इनके दरबार में आने लगे। लोग कोर्ट जाने से बेहतर इनके दरबार को समझने लगे थे।