डॉ. नीरज ने बताया कि इसके अलावा अगर गर्दन भी काट दी जाए तो जिंदा बच पाना संभव ही नहीं है। क्योंकि हमारा पूरा शरीर दिमाग के आदेश पर काम करता है और नाक से खींची गई ऑक्सीजन को हृदय खून के माध्यम से पूरे शरीर में पहुंचाता है और वापस खींचता है। गर्दन कटने पर यह दोनों क्रियाएं बंद हो जाती हैं। अगर इनमें से कोई एक प्रक्रिया भी बंद हो जाती है तो व्यक्ति की तत्काल मौत हो जाती है। ऐसे में सिर पर चोट से दिमाग शरीर को आदेश देना या संचालित करना बंद कर देता है तो शरीर काम करना बंद कर देता है। वहीं, दूसरी ओर ऑक्सीजन न मिलने पर दिल धड़कना बंद कर देता है और गर्दन कटने वाले व्यक्ति की मौत हो जाती है। मधुर की हत्या में ये दोनों ही काम किए गए जो आरोपी की बर्बरता को दर्शाता है।
घोपन बनिया के पुरखे जम्मू-कश्मीर में केसर की खेती किया करते थे। इसके बाद 1932 में घोपन बनिया गोरखपुर में आकर व्यापार करने लगे। शुरुआत किराने के सामान से की पर बाद में मौत के बाद अंत्येष्टि का सामान बेचने लगे। यहीं से उनका व्यापार बढ़ता चला गया। जाफरा बाजार निवासी वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश खुल्लर ने बताया कि 1932 में उनके दादा स्व. कुंदल लाल खुल्लर ने गोरखपुर में प्रैक्टिस शुरू की थी। इसके बाद 1948 में जाफरा बाजार में मकान बनवा लिया। तब से उनका परिवार यहीं पर है।
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बताते हैं कि उस समय भी अपनी दादी के मुंह से घोपन बनिया का नाम सुना था। आज भी परिवार सम्मानित है। पहले सभी लोग यहीं पर रहते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से परिवार के लोग अलग हैं और अब एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं है। लेकिन, परिवार में किस बात पर इतनी खटास पड़ी, यह कभी सार्वजनिक नहीं हो पाया। राजेश बताते हैं, शुरू से घोपन बनिया का परिवार संपन्न रहा और आज भी मधुर मुरली को छोड़कर सभी अपना व्यापार कर रहे हैं।
जाफरा बाजार स्थित घोपन बनिया की दुकान ।
- फोटो : अमर उजाला।
घर में ही किराए पर दुकान चलाने वाले अभिषेक बताते हैं, प्रिंस कभी कभार ही दुकान पर आता था, लेकिन उसके व्यवहार से कभी नहीं लगा कि वह कोई ऐसा जघन्य अपराध कर देगा। रुपयों के लिए इस समय परेशान था। कभी उसने यह नहीं बताया कि इतने रुपयों की जरूरत क्या है। बैंक से कर्ज की बात बताता था। अभिषेक बताते है कि प्रिंस के व्यवहार में बदलाव घटना के पहले तक कभी नहीं देखने को मिला।
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इस जगह पर की थी मधुर मुरली गुप्ता की हत्या।
- फोटो : अमर उजाला।
मधुर मुरली के पड़ोसी अरविंद कुमार बताते हैं, प्रिंस मोहल्ले में ज्यादा किसी से बातचीत नहीं किया करता था। आमने-सामने होने पर हाल-चाल हो जाता था। लेकिन, हमेशा सामने पड़ने पर इज्जत से बात करता था, उसे देखकर यह नहीं लगता था कि कभी ऐसा भी कर सकता है। आज भी यकीन कर पाना मुश्किल है। अरविंद कहते हैं, मृतक मधुर मुरली काफी अच्छे आदमी थे। हम लोग अक्सर दुकान पर चले जाते थे।
पड़ोसी रोहन बताते हैं, प्रिंस के व्यवहार से कभी नहीं लगा कि वह कुछ गलत कर सकता है। लेकिन, रुपयों के लिए परेशान था। व्यापार कई किए, लेकिन उसे घाटा ही होता चला गया। वह खुलकर दोस्तों के बीच कभी बात भी नहीं करता। परेशानी का जिक्र कभी मोहल्ले में एकत्र होने पर लोग करते भी थे तो वह ज्यादा कुछ बताता नहीं था। इस समय वह ऑनलाइन फूड डिलीवरी का काम कर रहा था।
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