कोविड का असर मां और बच्चों पर भी पड़ा है। इसकी वजह से स्टिलबर्थ के मामले काफी बढ़े हैं। गर्भावस्था के 20वें हफ्ते के बाद लेकिन डिलीवरी से पहले गर्भस्थ शिशु की मृत्यु होना स्टिलबर्थ कहलाता है। ये बातें आइसोपार्ब मिड टर्म हाइब्रिड के दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस के दौरान चिकित्सकों ने कहीं।
कॉन्फ्रेंस की शुरुआत गोरखपुर शहर के एक होटल में शनिवार को हुई। इसमें देश की सैकड़ों स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। देश-विदेश के कई चिकित्सक इस आयोजन से ऑनलाइन जुड़े। शनिवार को सेक्रेटरी डॉ. अमृता जयपुरियार, डॉ. राधा जीना, डॉ. रीना श्रीवास्तव, डॉ. सुरहीता करीम, डॉ. राजेश गुप्ता, डॉ. बबीता शुक्ला, डॉ. अनुभा गुप्ता, डॉ. मीनाक्षी गुप्ता और डॉ. अरुणा छापरिया ने भी उपस्थित लोगों को संबोधित किया।
कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन आयोजन समिति की अध्यक्ष डॉ. साधना गुप्ता, डॉ. उषा शर्मा, डॉ. मंजू गीता मिश्रा और आइसोपार्ब की सचिव डॉ. मीना सामंत ने किया। वक्ताओं के मुताबिक कभी-कभी तो गर्भ में ही शिशु का निधन हो जाता है जिसे इंट्रायूटरिन फीटल डेथ कहते हैं। ऐसी स्थिति में मां को संक्रमण, ब्लीडिंग, शॉक व अन्य खतरे होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। शनिवार को पहले दिन 75 रिसर्च पेपर प्रस्तुत किए गए। इनमें से तीन बेहतर रिसर्च पेपर को पुरस्कृत भी किया जाएगा।
सही समय पर इलाज बेहद जरूरी : डॉ. वत्सला
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. वत्सला ने बताया कि कुछ बीमारियां जैसे ब्लड प्रेशर, आरएच निगेटिव ब्लड ग्रुप, शुगर, हाइपरटेंशन, संक्रमण अगर गर्भावस्था के दौरान हो जाती हैं तो स्टिलबर्थ होने की आशंका बढ़ जाती है। अगर गर्भवती का ब्लड ग्रुप आरएच निगेटिव है, तो उन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।