गुजराती कहती हैं कि इस दर्द को हम लोग झेल तो बहुत दिन से रहे हैं, लेकिन गांव की बेटी ने हिम्मत की तो पुलिस आई है। अब दिन में कई बार पुलिस आकर गांव में घूमती है। पहले तो कोई सुनने वाला नहीं था। पुलिस आती भी थी तो कुछ करती नहीं थी। गुलाबी देवी ने बताया कि जिंदगी गांव में गुजर गईल, लेकिन, अइसन कब्बो ना रहल, जईसन अब भईल बा। अब केहू के डर नाहीं लागत बा।
लौजारी, सवित्रा कहती हैं कि बच्चों का भविष्य खराब हो रहा है। गांव का माहौल ऐसा हो गया है कि दिन में भी बच्चे निकलते हैं तो डर लगता है कि कहीं वे भी शराब के आदी न हो जाएं। मंजू कहती हैं कि गांव के कई बच्चे बिगड़ गए हैं। बहुत कम उम्र में ही वे शराब के आदी हो गए हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत महिलाओं और बच्चियों को होती है। गांव में जो लोग बाहरी आते हैं, वे छींटाकशी करते हैं। किस-किस से कोई झगड़ा कर सकता है।
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बेटा...तुम लोग शराब मत पीना...पुलिस साथ है
दोपहर डेढ़ बजे के करीब गांव की एक गली में दो पुलिस वाले भी नजर आए। वे नए उम्र के बच्चों को एकत्र कर समझा रहे थे। कह रहे थे कि बेटा, तुम लोग शराब मत पीना। कहीं से कोई जानकारी मिले तो बता देना। तुम लोगों का नाम भी सामने नहीं आएगा। पुलिस की कोशिश थी कि शराब बनाने वालों की जानकारी हासिल की जाए। मगर, इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि यह काम आसान नहीं है।
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खौफ ऐसा कि जानते सब हैं, बोलता कोई नहीं
गांव में शराब माफिया का खौफ ऐसा है कि कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। गांव का सबसे बड़ा शराब माफिया जयसराम है। पुलिस ने इस पर गैंगस्टर की कार्रवाई भी की थी, लेकिन वह फिर जमानत पर बाहर आ गया है। उसके खिलाफ बोलने के लिए कोई तैयार नहीं होता है। बताया तो यह भी जा रहा है कि सब कुछ उसके संरक्षण में ही चल रहा है। उसकी लोकल पुलिस से सेटिंग भी गहरी है। हालांकि, एडीजी के चौपाल के बाद पुलिस ने सक्रियता बढ़ा दी है। इस गांव में शराब की बिक्री पर पुलिस की नजर है।
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गांव की भौगोलिक स्थिति भी धंधेबाजों के अनुकूल
मूसाबर गांव की भौगोलिक स्थिति भी कच्ची शराब के धंधेबाजों के अनुकूल ही है। सरुआ ताल के किनारे गांव होने की वजह से ताल के रास्ते नाव से ये लोग फरार हो जाते हैं। इसी रास्ते का इस्तेमाल यह लोग शराब को ठिकानों तक पहुंचाने में भी करते हैं।