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गोरखपुर: यहां तो अनहोनी की आशंका में कटते हैं दिन-रात, टपकती हैं छतें

Tue, 12 Oct 2021 02:43 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।

सार

जटेपुर रेलवे कॉलोनी टाइप-टू के आवासों की टपकती हैं छतें, दीवारों में सीलन, रेलकर्मी के घर की छत गिरने के बाद डरे-सहमे हैं पड़ोसी।
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जर्जर बिल्डिंग। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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गोरखपुर के जटेपुर रेलवे कॉलोनी टाइप-टू के आवासों में रहने वाले रेलकर्मियों के रात-दिन अनहोनी की आशंका में कटते हैं। कॉलोनी के घर इस कदर खस्ताहाल हैं कि कब कौन-सा हिस्सा टूट कर गिर पड़े पता नहीं।  ज्यादातर घरों की छतें टपकती हैं। दीवारों में सीलन है। रेलकर्मी रमेश सिंह के घर की छत का एक हिस्सा गिरने के बाद उनके पड़ोसी इस कदर डर गए हैं कि उनकी निगाहें जमीन से ज्यादा छत पर टिकी रहती है। 

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अमर उजाला ने सोमवार को कॉलोनी के आवासों का हाल जानने के लिए पड़ताल की। ए-ब्लॉक के ज्यादातर आवासों की स्थिति एक जैसी मिली। कई घरों के बाहर की दीवारों में दरारें पड़ गईं हैं। घर के अंदर कमरों में जबरदस्त सीलन है। छत पर रखी टंकियां ऐसी हैं कि जैसे वर्षों से सफाई नहीं हुई। बारिश में छतों के टपकने से पंखे जल गए हैं। दीवारों में भी कभी-कभी करंट आ जाता है। इन आवासों रहने वाले रेलकर्मियों का कहना है कि दिन-रात किसी अनहोनी की आशंका में कटते हैं। कई रेलकर्मियों के घर में तो पूरा परिवार एक ही कमरे में सोता है।

जिसमें किसी की मौत हुई है उसमें कैसे रहें
रेलकर्मी रमेश सिंह 160 ए में रहते हैं। छह अक्तूबर को उनके घर में छत का कुछ हिस्सा गिर गया। रमेश सिंह का कहना है कि बिना उन्हें बताए 199-सी आवास आवंटित कर उनके दरवाजे पर नोटिस लगा दिया गया। वह कहते हैं कि जिस आवास को आवंटित किया है, उसमें दो वर्ष पहले एक रेलकर्मी ने आत्महत्या कर ली थी। अब वे 199-सी परिवार के साथ कैसे रहेंगे, सोचकर झुरझुरी आती है।
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लोगों ने क्या कहा

कई बार कहने के बाद भी कोई नहीं सुनता। घर की छतें टपकती हैं, जिससे सारा सामान खराब हो जाता है। आईओडब्ल्यू की ओर से हमें भी कहा गया है कि घर को खाली करके कहीं और शिफ्ट हो जाएं। अगर बेहतर आवास नहीं मिला तो हम नहीं जाएंगे। - रवींद्र नाथ यादव, 157 ए

दोनों कमरों की छतें टपकती हैं। दीवार में सीलन इतनी ज्यादा है कि सामान खराब हो रहा है। जब से बगल में छत गिरी है, हम लोग एक ही कमरे में सो रहे हैं। मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं, दिन-रात डर बना रहता है कि कहीं छत न गिर जाए।- इंदू यादव, 158 ए

भगवान का शुक्र है कि परिवार गांव गया था। अब जबरिया हम लोगों को ऐसे घर में भेजा जा रहा है, जहां एक रेलकर्मी ने आत्महत्या कर ली थी। बहुत सारे आवास खाली हैं, हमें वहां शिफ्ट कराया जाए।- रमेश सिंह, 160 ए
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