गोरखपुर में अधिग्रहण के बाद भी अभिलेखों में जीडीए का नाम दर्ज न किए जाने से प्राधिकरण की जमीन काश्तकारों ने दोबारा बेच दी। जीडीए कर्मचारियों, एसएलओ और तहसील कार्यालय की लापरवाही से नाम न दर्ज होने से ऐसी जमीन खरीदकर कई लोग फंस गए हैं।
कमिश्नर रवि कुमार एनजी ने इस लापरवाही पर सख्ती की है। उन्होंने एसएलओ और सदर तहसील प्रशासन पर नाराजगी व्यक्त करते हुए सात दिन के भीतर जीडीए द्वारा पूर्व में अधिगृहीत करीब 60 हेक्टेअर जमीन के राजस्व अभिलेखों पर प्राधिकरण का नाम दर्ज करने का निर्देश दिया है। वहीं प्राधिकरण को इस तरह की जमीन के बारे में पूरी जानकारी एसएलओ व सदर तहसील कार्यालय को उपलब्ध कराने को कहा है।
प्राधिकरण के मुताबिक इन सभी जमीनों के अधिग्रहण के समय ही संबंधित काश्तकारों को मुआवजा उपलब्ध कराने के लिए एसएलओ कार्यालय को धन आवंटित करा दिया गया था। काश्तकारों को मुआवजा मिल भी चुका है, मगर एसएलओ कार्यालय की तरफ से तहसील में राजस्व अभिलेखों पर काश्तकारों का नाम काटकर जीडीए का नाम न दर्ज होने से अब कई जगह की जमीनों पर अवैध कब्जा हो रहा है।
दस्तावेजों पर नाम नहीं चढ़ने से वर्तमान में जीडीए के तमाम ऐसे भूखंडों को काश्तकार बेच भी चुके हैं, कई लोग ठगी का शिकार बनकर प्राधिकरण के चक्कर लगा रहे हैं। ऐसे ही मामले में शहर के लच्छीपुर स्थित शास्त्रीनगर के 15 से अधिक लोग परेशान हैं। करोड़ों की लागत से मकान बनवाने के बाद पिछले साल उन्हें जीडीए की तरफ से नोटिस मिला की जमीन जीडीए की है।
नोटिस में जीडीए का कहना था कि यह जमीन 1990 के आसपास अधिग्रहीत की जा चुकी है और मुआवजा भी दिया जा चुका है। जबकि, यहां मकान बनवाकर रह रहे लोगों के अनुसार उन्होंने 2012-13 तक यहां के भूखंडों को काश्तकार से खरीदा था। तहसील में उस समय भी काश्तकार का ही नाम दर्ज था। जमीन की बाकायदा रजिस्ट्री हुई है।
कुछ लोगों को बैंक से घर बनवाने के लिए लोन भी मिला था। इसी तरह के अन्य मामले भी हैं, जिसमें लोगों के घर बनाने के बाद जीडीए की नोटिस पहुंचा। लच्छीपुर के अलावा मानबेला की करीब 12 एकड़ जमीन, खोराबार में भी 10 एकड़ से अधिक जमीन पर भी प्राधिकरण का नाम नहीं दर्ज हो सका है। इनमें से कई भूखंड, अधिग्रहण के बाद भी मूल काश्तकार बेच चुके हैं।
अध्यक्ष जीडीए/कमिश्नर रवि कुमार एनजी ने कहा कि जीडीए की तरफ से पूर्व में अधिगृहीत भूखंडों में से कुछ के राजस्व अभिलेखों पर प्राधिकरण का नाम नहीं चढ़ पाया है। अभियान चलाकर ऐसे भूखंडों के दस्तावेजों पर नाम चढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। नाम न चढ़ने की वजह से भू-माफिया के सक्रिय होने की सूचना मिल रही थी। कुछ भूखंड दोबारा भी बेचे जा चुके हैं। ऐसे मामलों में भी कार्रवाई हो रही है।