इसके अलावा, कुनराघाट के आगे विशुनपुरवा और कुसम्ही बाजार के पास भी खुले मैदान में जुआ खेला जा रहा है। यहां इन इलाकों के जमीन से लेकर सोने-चांदी के धंधेबाज और कारीगर खुलकर जुआ खेलते हैं। डांगीपार, दिव्यनगर, काॅर्मल स्कूल के पास भी धनतेरस की सुबह से ही जुआ चलता रहा।
इसके अलावा शहर में एक बेहद चर्चित नाम की तरफ से रुस्तमपुर और ट्रांसपोर्टनगर के पास बड़े पैमाने पर जुए का धंधा जोरों पर रहा। नेपाल के सैकड़ों लोग दीपावली के दिन अपनी किस्मत आजमाने गोरखपुर और आस-पास के जिलों में आते हैं। ऐसे में ये धंधा यहां खूब फलने-फूलने लगता है।
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मिनी कसीनो में बढ़ जाता है बीयर के बोतल का दाम
त्योहार के समय जुआ खेलवाने वाले कबाब और शराब का भी इंतजाम रखते हैं। सूत्र ने बताया कि रात में बीयर के बोतल की कीमत 800 रुपये तक हो जाती है। खेलते समय अधिकतर जुआ खेलने वाले बीयर ही पीना पसंद करते हैं। इसके अलावा संचालक, सफेदपोशों के लिए ब्रांडेड शराब का भी इंतेजाम रखते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें भारी कीमत देनी पड़ती है। बाहर बिकने वाली शराब के लिए दस गुना अधिक दाम देना पड़ता है। इसके अलावा रात के समय रजनीगंधा पान मसाले का दाम डेढ़ सौ रुपये तक हो जाता है।
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ताश की गड्डी से दिखाते हैं कलाबाजी
धंधे के एक सूत्र ने बताया कि ताश की गड्डी में अंदर-बाहर का खेल प्रमुख होता है। इसमें गड्डी फेंटकर उसमें से एक पत्ती निकाली जाती है। फिर गड्डी के पत्ते बाहर दाएं-बाएं तरफ फेंकते हैं। इसमें निकाली पत्ती जिस तरफ गिरती है, वो दांव जीत जाता है। ऐसे ही अगर तीन बार दांव एक ही जुआरी जीतता है तो उसे इसके बाद अगले हर दांव पर पांच सौ रुपये तक देना पड़ता है, जबतक गड्डी उसके हाथ में होती है। बड़े खिलाड़ी इस रकम को और बढ़ा देते हैं।
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प्रवेश शुल्क 500 रुपये से लेकर 1500 रुपये
जुआ के छोटे अड्डों पर प्रति जुआरी 500 रुपये और बड़े केंद्र पर 1500 रुपये प्रवेश शुल्क होता है। इसके बाद आने वाले जुआरियों को भी खेल के दांव में बिठाया जाता है, लेकिन शुल्क लेकर। इसके अलावा मौके पर ही 10 से 15 प्रतिशत ब्याज का भी खेल होता है। इसमें उधार लेने वाले को मौखिक रूप से ही देनदार को पास गिरवी रखना होता है।