गोरखपुर जिले के सभी शस्त्र लाइसेंस की मूल फाइलें अब सुरक्षित कर ली गई है। सभी का पीडीएफ तैयार कर उन्हें तीन प्रति में रखा गया है, ताकि एक गुम भी हो तो विकल्प के तौर पर दो मौजूद रहें। पीडीएफ फाइलों को कंप्यूटर के साथ ही अलग से हार्ड डिस्क, पैन ड्राइव और सीडी में रखा गया है। इस काम पर प्रशासन ने करीब एक लाख रुपये खर्च किए हैं।
पीडीएफ तैयार करने के दौरान पूरे समय शस्त्र अनुभाग का एक कर्मचारी मौजूद रहा तो वहीं काम खत्म होने के बाद जिला सूचना विज्ञान अधिकारी ने रेंडम जांच कर यह तस्दीक भी की है कि कोई फाइल या उसका पन्ना छूट तो नहीं गया या फिर स्कैनिंग साफ हुई या नहीं। प्रशासन के मुताबिक 29 जुलाई को पूरी हुई रेंडम जांच में पीडीएफ बनाने का काम दुरुस्त मिला है।
दो साल पहले 2029 के अगस्त महीने में ही सामने आए सनसनीखेज फर्जी शस्त्र लाइसेंस मामले के बाद प्रशासन ने कार्रवाई के साथ ही एहतियातन सभी शस्त्र फाइलों के पीडीएफ तैयार करने का निर्णय किया था। दरअसल सभी शस्त्र लाइसेंस के सत्यापन के लिए, जब वर्षों पुरानी फाइलों को खंगाला गया तो उनमें कई फाइलें ऐसी मिली जो रखरखाव के अभाव में नष्ट होती दिख रही थी। किसी में लिखावट की स्याही हल्की हो रही थी तो किसी को दीमक चाट रहे थे। ऐसे में इन्हें सुरक्षित किया जाना जरूरी समझा गया।
तत्कालीन डीएम के. विजयेंद्र पांडियन के निर्देश पर शस्त्र लाइसेंस की मूल फाइलों का पीडीएफ तैयार कराने के लिए 24 फरवरी 2020 को निविदा आमंत्रित की थी। उसके कुछ समय बाद ही कोरोना का प्रकोप शुरू हो गया, जिससे काम प्रभावित हो गया। 2021 में दूसरी लहर का प्रभाव कम होने के बाद काम शुरू हुआ जो अब जाकर पूरा हुआ है।
भुगतान के लिए चक्कर लगा रहे हैं, फर्म के मालिक
जिले में 22989 शस्त्र लाइसेंस जारी किए गए हैं। इनसे जुड़ी मूल फाइलों को सुरक्षित करने के लिए पीडीएफ बनाने वाली फर्म को अभी तक कोई भुगतान नहीं हुआ है। फर्म के मालिक चंद्र प्रकाश यादव भुगतान के लिए कलेक्ट्रेट के चक्कर लगा रहे हैं।
कभी पैर रखने की जगह नहीं थी, अब फैला रहता है सन्नाटा
कलेक्ट्रेट स्थित जिस शस्त्र कार्यालय में दो साल पहले तक पूरे दिन पैर रखने की जगह नहीं मिलती थी, वहीं फर्जी शस्त्र लाइसेंस मामले सामने आने के बाद से अब सन्नाटा पसरा रहता है। सिर्फ शस्त्र लाइसेंस के नवीनीकरण और वरासत संबंधी मामलों को लेकर ही कुछ लोग वहां पहुंच रहे हैं। वे भी खामोशी से अपनी बात रखते और काम खत्म होते ही वहां से निकल लेते हैं। हालांकि, अब भी शस्त्र कार्यालय की तरफ किसी के कदम बढ़ते हैं तो आसपास बैठे कर्मचारियों, लोगों की निगाहें उसपर गड़ जाती हैं। मामला उजागर होने के बाद तैनात एक असलहा बाबू ने तो अनुरोध कर वहां से अपना तबादला बांसगांव तहसील में करा लिया था।
फिलहाल प्रशासन की तरफ से अब कोई जांच नहीं हो रही
हाल ही में एसएसपी दिनेश कुमार प्रभु की तरफ से फर्जी शस्त्र लाइसेंस के मामले में नई एसआईटी गठित करने के बाद से एक बार फिर यह मामला गरमा गया है। शस्त्र लाइसेंसों की दोबारा जांच को लेकर एक स्थानीय अखबार में आधारहीन खबर प्रकाशित करने के बाद इस मामले से जुड़े लोगों के साथ ही पूरे जिले में इसकी चर्चा भी है, मगर जिला प्रशासन का साफ कहना है कि इस तरह से इस मामले में फिलहाल अब कोई जांच नहीं कराई जा रही है। प्रशासन का कहना है कि पूर्व डीएम के. विजयेंद्र पांडियन के निर्देश पर तत्कालीन एडीएम सिटी राकेश कुमार श्रीवास्तव और तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट व एसडीएम सदर प्रथमेश कुमार के नेतृत्व में जिले के सभी शस्त्र लाइसेंस का सत्यापन कराया जा चुका है और कार्रवाई भी हो चुकी है।
इनसेट के साथ कोट
डीएम विजय किरन आनंद ने बताया कि मामला पुराना है। मुझे फर्जी शस्त्र लाइसेंस के मामले की जानकारी नहीं है। फिलहाल मेरी तरफ से जांच के कोई आदेश नहीं दिए गए हैं। पुलिस जांच करा रही होगी तो मुझे जानकारी नहीं। शस्त्र अनुभाग समेत सभी पटलों पर तैनात कर्मचारियों को संबंधित फाइलों का ठीक ढंग से रखरखाव का निर्देश दिया गया है।