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स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को न मिला कोटे का फायदा, वो तो गोद लिए हुए ही उठा गए ज्यादा

Sun, 02 Feb 2020 04:55 PM IST
विजय जैन शोभित कुमार पांडेय, गोरखपुर/संतकबीरनगर।
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यशोमित्र उर्फ वसुमित्र - फोटो : अमर उजाला
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खलीलाबाद शहर के बरदहिया बाजार में रहने वाला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का परिवार सेनानी कोटे के लाभ से वंचित है, जबकि उनसे जुड़े लोग इसका फायदा उठाने में सफल हो गए। कपड़े का कारोबार कर गुजर बसर कर रहे परिवार को इसका मलाल भी है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के छोटे बेटे अभयजीत के पुत्र स्वतंत्र ने बीटेक किया है लेकिन नौकरी नहीं मिल सकी।
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गोरखपुर के नौसड़ के मूल निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यशोमित्र उर्फ वसुमित्र जाने माने वैद्य थे। करीब 50 वर्ष पूर्व वह खलीलाबाद आए थे। बरदहिया बाजार में दवा की दुकान खोली और साइकिल से गांव-गांव घूम कर मरीजों का नि:शुल्क उपचार करते थे। वसुमित्र के छोटे बेटे अभयजीत (50 ) बताते हैं कि उनके पिता ने गुरुकुल अयोध्या से शास्त्री तक की शिक्षा ग्रहण की थी। वह गरीबों का मुफ्त उपचार करते थे।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रभावित होकर वह आजादी की जंग में पिता कूद पड़े। अंग्रेजों ने वसुमित्र को दो बार (गुलबर्गा व हैदराबाद ) जेल भेजा। करीब छह महीने वह जेल में रहे।
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वसुमित्र के तीन बच्चे सर्वजीत, अभयजीत और मनोरमा

वसुमित्र के तीन बच्चे सर्वजीत, अभयजीत और मनोरमा हुए। अभयजीत बताते हैं कि बहन मनोरमा की शादी बस्ती जिले के मुंडेरवा में हुई है, जबकि बड़े भाई दिवंगत सर्वजीत जायसवाल का परिवार नौसड़ गोरखपुर में ही रहता है। बड़े भाई के तीन बेटे व एक बेटी हैं। बड़े भाई के तीनों बेटे कपड़े, हार्डवेयर और कास्मेटिक की दुकान चलाते हैं। अभयजीत के चार बेटे अमित ,सौरभ, चंचल और स्वतंत्र हैं। एक बेटी भी है।

तीन बेटे मिलकर बरदहिया बाजार में कपड़े की दुकान चलाते हैं। छोटा बेटा स्वतंत्र बीटेक करने के बाद दो साल से बेटा नौकरी के लिए संघर्ष कर रहा है। अभयजीत ने बताया कि उनके पिता को पेंशन मिलती थी। 29 मार्च 2003 को पिता की मौत हो गई तो मां को पेंशन मिलने लगी। वर्ष 2016 में मां भानमती की भी मौत हो गई। लेकिन अब तक सेनानी कोटे का लाभ उनके परिवार को नहीं मिल पाया है।

दो साल पहले दुकान में आग लगने में दस लाख का हुआ था नुकसान

हियुवा के पूर्व नगर संयोजक एवं सेनानी के पौत्र सौरभ जायसवाल बताते हैं कि बरदहिया बाजार में स्थित उनकी कपड़े की दुकान में दो साल पहले शार्ट सर्किट से आग लग गई थी। करीब दस लाख का नुकसान हुआ था। लेकिन शासन- प्रशासन से उनके परिवार को कोई मदद नहीं मिली। परिवार को अपने इतिहास पर फख्र है,लेकिन अभी तक कोई लाभ नहीं मिला।
 
पारिवारिक रजिस्टर पर भी सवाल
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पारिवारिक रजिस्टर पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। आरोप है कि पारिवारिक रजिस्टर में 15वें स्थान पर रमेश चंद्र का नाम आता है। 16वें स्थान पर पत्नी बिंदू के साथ ही बेटे पवन और अमित का नाम भी दर्ज है।

खास बात यह है कि पारिवारिक रजिस्टर में यशोमित्र की पत्नी भानमति, बड़े पुत्र सर्वजीत, छोटे बेटे अभयजीत के अलावा पारिवारिक सदस्य अनारकली, दीपू, पारूल का नाम पहले दर्ज है। रमेश चंद्र व उसके बेटों का नाम बाद में दर्ज कराया गया है। प्रशासन के मुताबिक यदि रमेश चंद्र को पांच वर्ष की उम्र में गोद लिया गया होता तो पारिवारिक रजिस्टर में यशोमित्र व उनकी पत्नी भानमति के बाद रमेश का नाम आता।
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गोरखपुर के पारिवारिक रजिस्टर में नहीं है यशोमित्र का नाम

जसवल बाजार के मंझरिया ग्राम सभा के रमेश चंद्र का गोरखपुर के जंगलकौड़िया विकास खंड में जो पारिवारिक रजिस्टर बना है, उसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यशोमित्र उर्फ वसुमित्र का नाम नहीं है। रमेश चंद्र पुत्र किशोरी लाल दर्शाया गया है।

एमबीबीएस की डिग्री हासिल करने वाले पंकज, पवन, पुनीत और अमित का नाम भी इस रजिस्टर में है। रमेश के जिस भाई सुनील ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का पौत्र बनकर एमबीबीएस की डिग्री हासिल की है, उनके पिता का नाम पारिवारिक रजिस्टर में किशोरी दर्ज है।  

कोट
सारे दस्तावेज सही हैं। पिछले 10 वर्षों से जांच चल रही है। जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी कैंपियरगंज की जांच में क्लीन चिट मिल चुकी है। शिकायत और जांच सिर्फ परेशान कराने के लिए की जा रही है। जांच में सब साफ हो जाएगा।
- रमेश चंद्र
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