सवाल यह है कि जिले में तैनात शिक्षक के पैन नंबर का दूसरे जिले में हो रहे इस्तेमाल के मामले को यहां के जिम्मेदार क्यों नहीं पकड़ सके। जल्द बर्खास्त हुए सभी छह फर्जी शिक्षकों के मामले में दूसरे जिले के अधिकारियों ने ही फर्जी दस्तावेज एवं पैन नंबर को इस्तेमाल करने की शिकायत की। तब जाकर यहां के जिम्मेदार जागे और जांच कराई। 26 वर्ष में कभी यहां के जिम्मेदारों की आंख नहीं खुलीं और फर्जी अध्यापक वेतन उठाते रहे। अगर दूसरे जिले से शिकायत नहीं मिलती तो शायद फर्जी अध्यापक सेवानिवृत्त भी हो जाते और विभाग को उनके फर्जीवाड़े का पता नहीं चल पाता।
पहले नहीं होता था पैन नंबर का इस्तेमाल
फर्जी अध्यापकों की नियुक्ति के समय वर्ष 1995 से 2010 तक के बीच पैन नंबर का इस्तेमाल करने का प्रचलन नहीं रहा। इस लिए इन अध्यापकों का फर्जीवाड़ा छिपा रहा। अब जब वर्तमान में आधार एवं पैन नंबर का इस्तेमाल हो रहा है तो इस तरह के पुराने मामलों का पर्दाफाश होता जा रहा है। बेसिक शिक्षा विभाग में नियुक्ति की प्रक्रिया भी अन्य विभागों से हटकर है। जहां अन्य विभागों में शैक्षिक दस्तावेज एवं पुलिस सत्यापन के बाद ही नियुक्ति होती है। वहीं बीएसए में नियुक्ति के बाद सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की जाती है और बाद सिर्फ शिकायत पर ही सत्यापन अथवा जांच होती है।
अभी और भी शिक्षक हैं जांच के दायरे में
शिक्षकों के नियुक्ति में फर्जीवाड़े के पर्दाफाश का सिलसिले अभी थमा नहीं है, विभागीय सूत्रों के अनुसार, जल्द ही कुछ अन्य शिक्षकों पर भी कार्रवाई हो सकती है। इनके भी मामले में दूसरे जनपदों से फर्जी शैक्षिक अभिलेख एवं पैन नंबर आदि दस्तावेजों का इस्तेमाल करने की शिकायत की गई है। विभागीय जांच चल रही है और सत्यापन भी हो रहा है। मामले में आरोपित शिक्षकों का पक्ष सुनने के लिए नोटिस भी दिया गया है, लेकिन अधिकांश फर्जी शिक्षक अभिलेखों के साथ कार्यालय में उपस्थित होने नहीं होते और फरार हो जाते हैं।