हालांकि अभी उनकी शिकायतों पर जांच और कार्रवाई नहीं हुई है। रेलवे में ठेकेदारी करने वालों ने बताया कि पहले जिस विभाग में जिस वस्तु की सप्लाई करनी होती है, उसके लिए संबंधित विभाग के अफसर की सेवा करनी पड़ती है। यहां एडवांस देने पर सामग्री की डिमांड तैयार होती है। इसके बाद जैम पोर्टल के जरिए टेंडर होता है।
इसे भी पढ़ें: बदल रहा है गोरखपुर: एयरपोर्ट पर आज से यात्रियों के लिए खुलेगी नई टर्मिनल बिल्डिंग, मानकों पर उतरा था खरा
टेंडर के लिए सेलेक्ट संस्थाओं के बीच रस्साकशी का फायदा भी अफसरों को ही मिलता है और मामला सेट होने पर यहां भी एडवांस लेकर टेंडर जारी होता है। इसके बाद माल आपूर्ति होती है, जिसका बिल जमा करने और भुगतान होने पर भी सुविधा शुल्क देना होता है। इसके अलावा भागदौड़, चाय-नाश्ता, गेटमैन को सुविधा शुल्क आदि का भुगतान तो सामान्य चलन में है।
रेल कर्मियों में चर्चा है कि इस मामले की जड़ें विजलेंस जांच से जुड़ी हैं। दरअसल विजलेंस जांच में फंसे एक अफसर की फाइल में एक रिपोर्ट लगनी थी, जिसके बदले पांच लाख रुपये की डिमांड हुई। रुपये नहीं मिले तो रिपोर्ट भी नहीं लगी। यह बात अन्य अफसरों को भी खटकी और लेन देन के मामले बाहर आने लगे। वहीं यह भी चर्चा है कि हर डिपार्टमेंट से महीने की बंधी-बंधाई रकम को लेकर भी तनातनी चल रही थी। एक वरिष्ठ अफसर इस मामले से खुद को अलग रखे हुए थे।
इसे भी पढ़ें: रेलवे अफसर रिश्वतखोरी कांड: कागजों में दौड़ती रही कबाड़ की कार, अभी खुलेंगे घोटाले हजार
अपने-अपने रिकाॅर्ड दुरूस्त कर रहे सभी डिपार्टमेंट
विभागीय जानकारों का कहना है कि इस वक्त सबसे अधिक तनाव हर डिपार्टमेंट में पिछले एक साल के दौरान मंगाए गए सामानों को लेकर है। रजिस्टर से लेकर स्टोर तक को अपडेट किया जा रहा है, जिससे कि कहीं आवश्यकता से अधिक डिमांड की कहानी बाहर न आ जाए, वरना जिनका सीधा संबंध नहीं है, वे भी लपेटे में आ जाएंगे।