डॉ. तपस ने बताया कि ऑनलाइन क्लास के बाद हो सके तो बच्चों को तत्काल मोबाइल फोन से दूर कर दें। क्लास के बाद परिवार के लोग उनसे बात करें। बच्चों को सोशल साइट्स से दूर रहने की सलाह दें। उन्हें समझाएं। बताया कि ऐसी स्थिति में किसी दवा की जरूरत नहीं है। बेहतर काउंसिलिंग के जरिए उनकी इन आदतों को दूर किया जा सकता है।
उदाहरण के ये दो केस पढ़ें-
रुस्तमपुर के रहने वाले प्रशांत जायसवाल ने बच्चे के ऑनलाइन क्लास के लिए उसे नया मोबाइल फोन खरीद कर दिया। क्लास खत्म होते ही बच्चा सोशल साइट पर व्यस्त हो जाता था। इसकी वजह से उसे नींद न आने की शिकायत होने लगी। डॉक्टरों ने काउंसिलिंग की और बताया कि बच्चा नोमोफोबिया का शिकार है।
राजेंद्र नगर के रहने वाले शिक्षक संजय द्विवेदी का बेटा ऑनलाइन क्लास के बाद दोस्तों का एक व्हाट्स ग्रुप बनाकर चैटिंग करने लगा। बीच-बीच में वह जोर-जोर से हंसने भी लगता था। नींद खुलते ही वह पहले मैसेज को चेक करता है। परिजन डॉक्टर के पास ले गए। काउंसिलिंग के दौरान पता चला कि उसे नोमोफोबिया हुआ है। इसके बाद परिजन क्लास के बाद बच्चे का मोबाइल फोन अपने पास रख लेते हैं।