राष्ट्रीय लोक अदालत को संबोधित करते जपद न्यायधीश।
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राष्ट्रीय लोक अदालत में शनिवार को 1,06,400 वादों का निस्तारण किया गया। इनमें प्री-लिटिगेशन स्तर पर विभिन्न बैंक, कंपनियों व भारत दूरसंचार निगम से संबंधित 1395 वादों का निस्तारण कर 2,67,20,440 रुपये जमा करवाए गए। पारिवारिक वाद के 51 मामलों का भी निस्तारण हुआ।
लोक अदालत का शुभारंभ जनपद न्यायाधीश, अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डलसा) गोरखपुर तेज प्रताप तिवारी ने सुबह साढ़े दस बजे दीवानी न्यायालय परिसर स्थित मीटिंग हॉल में किया। उन्होंने 23 वादों का निस्तारण किया। अदालत में वाणिज्यिक न्यायालय के पीठासीन अधिकारी वीर नायक सिंह की अदालत में 23 मामले सुलझाए गए। मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण के पीठासीन अधिकारी भगवती प्रसाद सक्सेना ने 202 मामलों में फैसला सुनाया। स्थायी लोक अदालत के चेयरमैन गिरिजेश कुमार पांडेय ने पांच मामलों में दोनों पक्ष की सहमति से फैसला सुनाया। परिवार न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश देवेंद्र सिंह की अदालत में 51 मामलों की सुनवाई हुई। अपर जनपद न्यायाधीश प्रथम सत्यानंद उपाध्याय, नोडल अधिकारी लोक अदालत जयप्रकाश बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भानू प्रताप पांडेय और मंत्री अनुराग दूबे के साथ ही अन्य न्यायिक अधिकारीगण उपस्थित रहे।
आपराधिक प्रवृत्ति के 186583 मामले भी सुलझाए गए
जनपद के अपर जिलाधिकारी (प्रशासन), नोडल अधिकारी, उप जिलाधिकारीगण सहित अन्य राजस्व अधिकारियों के विभिन्न न्यायालयों में आपराधिक प्रकृति के 186583 मामलों का निस्तारण सुलह समझौते के आधार पर किया गया। इन वादों में 5,93,890 रुपये अर्थदंड वसूला गया। जनपद न्यायालय, गोरखपुर में 19,198, राजस्व व अन्य विभागों में 85,807 वादों का निस्तारण किया गया।
बैंक, कंपनियों के केस में 2.67 करोड़ की वसूली
उप्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ के अनुमोदन और जनपद न्यायाधीश के आदेशानुसार बैंक ऋण से संबन्धित प्री-लिटिगेशन स्तर पर विभिन्न बैंकों, कंपनियों व भारत दूरसंचार निगम से संबंधित 1395 वादों का निस्तारण कर 2,67,20,440 रुपये नगद जमा कराया गया। इस तरह राष्ट्रीय लोक अदालत में कुल 1,26,756 वाद निश्चित किये गये थे जिसमें से 1,06,400 वादों का निस्तारण किया गया।
इन मामलों की होती है सुनवाई
लोक अदालत में ऐसे असंज्ञेय आपराधिक मामले जिन्हें आपसी सहमति से सुलझाया जा सकता है, के साथ सभी प्रकार के दीवानी मामलों को लाया जा सकता है। वैवाहिक, सिविल, पेंशन और अन्य सेवा संबंधी मामले जैसे कि रेलवे मुआवजा, श्रम विवाद, भूमि अधिग्रहण, मनरेगा से जुड़े मामले, बिजली और पानी से जुड़े मामले, आपदा मुआवजा जैसे कि फसल में आग लग जाना आदि मामलों का निस्तारण किया जाता है।
स्थायी और अस्थायी लोक अदालत में होती है सुनवाई
हर जिले में एक स्थायी लोक अदालत होती है। इस लोक अदालत में एक करोड़ रुपये तक के मामलों की सुनवाई हो सकती है। स्थायी लोक अदालत में वाद सीधे ही ले जाया जा सकता है। अस्थायी लोक अदालत का आयोजन राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से समय-समय पर करवाया जाता है। स्थायी लोक अदालत आपसी सहमति नहीं होने पर भी फैसला सुना सकती हैं। यह फैसला दोनों पक्ष के लिए बाध्यकारी होगा।
अस्थायी लोक अदालत सर्वोच्च न्यायालय से लेकर तहसील स्तर तक आयोजित होती है। अस्थायी लोक अदालत में रुपयों की कोई सीमा नहीं होती यानी इसमें एक करोड़ और उससे अधिक के वाद की सुनवाई हो सकती है। अस्थायी लोक अदालत में बिना कोर्ट की अनुमति के किसी भी केस का आवेदन नहीं किया जा सकता। अस्थायी लोक अदालत में दोनों पक्ष की आपसी सहमति नहीं होने पर समझौता नहीं होगा, यानी अस्थायी अदालत केवल सलाहकारी भूमिका अदा करती है।