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एक ऐसी शख्सियत, केवल नाम ही नहीं इनके काम से भी 'गुलज़ार' है बॉलीवुड

Sun, 18 Aug 2019 12:17 PM IST
Avinash Pal अविनाश सिंह पाल, अमर उजाला
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गुलजार - फोटो : अमर उजाला
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गुलजार... एक ऐसा नाम जो किसी पहचान का मोतहाज नहीं है। वैसे तो गुलजार की पहचान प्रसिद्ध गीतकार के रूप में है लेकिन उन्होंने पटकथा लेखन, फिल्म निर्देशन, नाट्यकला, कविता लेखन में भी महारत हासिल है।18 अगस्त को गुलजार का जन्मदिन होता है। सिख परिवार में जन्मे गुलजार का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है।

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गुलजार ने अपनी कलम के दम पर अपने लिए एक बड़ा मुकाम बनाया। आज न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी गुलजार के फैंस मौजूद हैं। गुलजार के व्यक्तित्व का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो बीस बार फिल्मफेयर और पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम कर चुके हैं। इसके साथ ही 2010 में उन्हें स्लमडॉग मिलेनियर के गाने 'जय हो' के लिए ग्रैमी अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। वहीं गुलजार को प्रतिष्ठित दादा साहब फालके पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। इस खास रिपोर्ट में बात करते हैं गुलजार की जिंदगी और उनके लेखन के बारे में....

गैरेज में करते थे काम

गुलजार
दीना, झेलम जिला, पंजाब, ब्रिटिश भारत में 18 अगस्त 1936 को संपूर्ण सिंह कालरा उर्फ गुलजार का जन्म हुआ था, जो कि अब पाकिस्तान में है। विभाजन के समय गुलजार का परिवार पंजाब के अमृतसर में आकर बस गया। वहीं गुलजार मुंबई चले आए। मुंबई में गुलजार ने एक गैरेज में बतौर मैकेनिक काम किया। वहीं  खाली समय में शौकिया तौर पर कविताएं लिखने लगे। लेकिन कुछ वक्त बाद उन्होंने गैरेज का काम छोड़ हिंदी सिनेमा के मशहूर निर्देशक बिमल राय, हृषिकेश मुख़र्जी और हेमंत कुमार के सहायक के रूप में काम करना शुरू कर दिया।

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गुलजार के किस्से....

gulzar and rakhi - फोटो : social media
राखी से ले लिया था तलाक
गुलजार अपने काम के साथ ही अपने निजी जीवन को लेकर भी सुर्खियों में रहे थे। गुलजार ने 60 और 70 के दशक की मशहूर अभिनेत्री राखी से शादी की थी। लेकिन उनकी शादी लंबे वक्त तक नहीं टिकी और दोनों का तलाक हो गया। इस बारे में गुलजार की बेटी मेघना कहती हैं- अच्छा ही हुआ दोनों अलग हो गए। क्योंकि मतभेद होने के बावजूद साथ रहने से अच्छा है सुकून के साथ अलग-अलग रहना। दोनों ने अपने एकाकीपन को काम से भर लिया है।'

कार्यक्रम और सफेद कुरता पायजामा
गुलजार हर एक कार्यक्रम में सफेद कुरता पायजामा पहने नजर आते हैं। इस पर मेघना कहती हैं- 'मुझे कभी लगा नहीं कि ये बदलना चाहिए। जब हम एक दफे न्यूयॉर्क गए थे तो वहां मैंने पापा को एक ब्लू या ग्रे विंटर कोट खरीदकर दिया था। इसके अलावा मैंने कभी भी उन्हें रंगीन कपड़ों में नहीं देखा। मेरी शादी पर भी उन्होनें ऑफ व्हाइट रंग का कुर्ता पहना था।'

फिल्मी गानें लिखना नहीं था पसंद
गुलजार ने 60 के दशक से लेकर अब तक ढेरों गीत लिखे हैं। वो हर किस्म के गाने लिखने में माहिर हैं। लेकिन काफी कम लोगों को पता है कि उन्हें फिल्मी गाने लिखना कुछ खास पसंद नहीं था। बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में गुलजार ने बताया कि शायरी उनका पहला प्यार है, और जब उन्होंने अपने करियर का पहला फिल्मी गीत 'मोरा गोरा अंग लई ले' लिखा तो वो फिल्मों के लिए गाने लिखने को लेकर बहुत ज्यादा उत्सुक नहीं थे, लेकिन फिर एक के बाद एक गाने लिखने का मौका मिलता गया और वो गाने लिखते चले गए। 'इस मोड़ से आते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते', 'मुसाफिर हूं यारों', 'आने वाला पल जाने वाला है', 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है' से लेकर 'कजरारे-कजरारे' और 'बीड़ी जलई ले' जैसे गाने गुलजार के लेखन का ही कमाल हैं।

लता और सचिनदेव बर्मन का झगड़ा सुलझाया
60 के दशक में लता और सचिनदेव बर्मन के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा चल रहा था और लता, उनके लिए गा नहीं रही थीं। लेकिन इस झगड़े को खत्म किया गुलजार की लेखनी ने। एक इंटरव्यू में लता ने कहा था- 'बर्मन दादा के साथ मेरा झगड़ा चल रहा था। इस बीच एक दिन उनका फोन आया कि एक नया लड़का आया है उसने फिल्म 'बंदिनी' के लिए ये गाना लिखा है 'मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे'। मुझे ये गाना इतना पसंद आया कि मैं गाने के लिए मान गई।'

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गुलजार के लिखे 10 फेमस फिल्मी डायलॉग्स

gulzar
सिर्फ फिल्मों के लेखन ही नहीं 'आंधी', 'मौसम', 'मेरे अपने', 'कोशिश', 'खुशबू', 'अंगूर', 'लिबास' और 'माचिस' जैसी कई शानदार फिल्मों का निर्देशन कर चुके है। ऐसे में एक नजर गुलजार के लिखे 10 फेमस फिल्मी डायलॉग्स पर...

1. फिल्म: आनंद (1971)
'बाबूमोशाय , जिंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ है…उसे न आप बदल सकते हैं न मैं!'

2. फिल्म: नमक हराम (1973)
'जीने की आरजू में मरे जा रहे हैं लोग.… मरने की आरजू में जीए जा रहा हूं मैं!'

3. फिल्म: माचिस (1996)
'अरे कोई एक आदमी लड़ने के लिए गया और जाकर आजादी उठा कर ले आया और लाकर हमें दे दी के ये लो….आजादी तुम्हारे लिए लाए हैं बांट लो!'

4. फिल्म: साथिया (2002)
'घर छोड़के शादी करने में एक फायदा है.…लड़की बार बार माइके जाने की धमकी नहीं देती।"

5. फिल्म: आंधी (1975)
'मेरा शौहर बनने की कोशिश मत करो। बीवी हो, बीवी की तरह रहो।'

6. फिल्म: इजाजत (1987)
'वहीं...वही शहर है, वही गली, वही घर,सब कुछ.… सब कुछ वही तो नहीं है।"

7. फिल्म: अंगूर (1982)
'अब गुलाब का फूल खूबसूरत है तो है। अब वो खूबसूरत क्यों है, अबे छोड़ो ना यार।'

8. फिल्म: चुपके चुपके (1975)
'हमारे देश में नमक खाने को तो मिलता नहीं। छिड़कने को कहां से मिलेगा, क्यों जीजाजी!'

9. फिल्म: बावर्ची (1972)
'किसी बड़ी खुशी के इंतजार में हम ये छोटी छोटी खुशियों के मौके खो देते हैं।'

10. फिल्म: आनंद(1971)
'जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं बाबू मोशाय। जब तक जिंदा हूं, मरा नहीं। जब मर गया, तो साला मैं ही नहीं।'

लाजवाब हैं गुलजार के ये 12 शेर

gulzar
-आइना देख कर तसल्ली हुई , हम को इस घर में जानता है कोई
-शाम से आँख में नमी सी है, आज फिर आप की कमी सी है
-जिंदगी यूँ हुई बसर तन्हा, काफिला साथ और सफर तन्हा 
-वक्त रहता नहीं कहीं टिक कर, आदत इस की भी आदमी सी है
-कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ , किसी की आँख में हम को भी इंतिजार दिखे
-आदतन तुम ने कर दिए वादे, आदतन हम ने ए'तिबार किया
-हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते, वक्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते 
-हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में, रुक कर अपना ही इंतिजार किया
-मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को, मगर ये रोज गई बात छेड़ देती है 
-जिस की आँखों में कटी थीं सदियां, उस ने सदियों की जुदाई दी है
-कितनी लम्बी खामोशी से गुजरा हूँ, उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की 
-एक ही ख्वाब ने सारी रात जगाया है, मैं ने हर करवट सोने की कोशिश की  


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गुलजार की 5 उम्दा गजलें

gulzar
-दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई 
जैसे एहसाँ उतारता है कोई 
दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म 
जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई 
आइना देख कर तसल्ली हुई 
हम को इस घर में जानता है कोई 
पेड़ पर पक गया है फल शायद 
फिर से पत्थर उछालता है कोई 
देर से गूँजते हैं सन्नाटे 
जैसे हम को पुकारता है कोई 

-दर्द हल्का है साँस भारी है 
जिए जाने की रस्म जारी है 
आप के ब'अद हर घड़ी हम ने 
आप के साथ ही गुजारी है 
रात को चाँदनी तो ओढ़ा दो 
दिन की चादर अभी उतारी है 
शाख पर कोई कहकहा तो खिले 
कैसी चुप सी चमन पे तारी है 
कल का हर वाकिआ तुम्हारा था 
आज की दास्तां हमारी है 

-ऐसा खामोश तो मंजर न फना का होता 
मेरी तस्वीर भी गिरती तो छनाका होता 
यूँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता 
कोई एहसास तो दरिया की अना का होता 
साँस मौसम की भी कुछ देर को चलने लगती 
कोई झोंका तिरी पलकों की हवा का होता 
काँच के पार तिरे हाथ नजर आते हैं 
काश खुशबू की तरह रंग हिना का होता 
क्यूँ मिरी शक्ल पहन लेता है छुपने के लिए 
एक चेहरा कोई अपना भी खुदा का होता

-बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद 
कोई साजिश छुपा रहा है चाँद 
जाने किस की गली से निकला है 
झेंपा झेंपा सा आ रहा है चाँद 
कितना गाजा लगाया है मुँह पर 
धूल ही धूल उड़ा रहा है चाँद 
कैसा बैठा है छुप के पत्तों में 
बागबाँ को सता रहा है चाँद 
सीधा-सादा उफुक से निकला था 
सर पे अब चढ़ता जा रहा है चाँद 
छू के देखा तो गर्म था माथा 
धूप में खेलता रहा है चाँद 

-हवा के सींग न पकड़ो खदेड़ देती है 
जमीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है 
मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को 
मगर ये रोज गई बात छेड़ देती है 
जमीं सा दूसरा कोई सखी कहाँ होगा 
जरा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है 
रुंधे गले की दुआओं से भी नहीं खुलता 
दर-ए-हयात जिसे मौत भेड़ देती है 

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