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बदल रहा है सिनेमा: बायोपिक से मोटिवेशन तो फिक्शन से एंटरटेनमेंट

Sat, 29 Jun 2019 07:48 AM IST
Avinash Pal अविनाश पाल, अमर उजाला
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बदल रहा है सिनेमा - फोटो : अमर उजाला
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भारतीय सिनेमा की उम्र 100 साल से भी अधिक हो चुकी है। इन सौ से अधिक सालों में कई लोगों ने कई तरीकों से भारतीय सिनेमा में अपना- अपना योगदान दिया। हालांकि अगर इस सफर की शुरुआत का क्रेडिट दादासाहेब फाल्के और आर्देशिर ईरानी ईरानी को दिया जाए तो गलत नहीं होगा। 1913 में दादासाहेब फाल्के की फिल्म 'राजा हरीशचंद्र' रिलीज हुई थी। राजा हरीशचंद्र एक मूक (साइलेंट) और ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म थी। इसके बाद 1931 में पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' रिलीज हुई थी। फिल्म का डायरेक्शन आर्देशिर ईरानी ने किया था। वहीं भारतीय सिनेमा में रंग डालने का काम भी आर्देशिर ईरानी ने ही किया। 1937 में भारतीय सिनेमा को पहली रंगीन फिल्म का तोहफा मिला। फिल्म का नाम था 'किसान कन्या'। 1913 से 2019 तक भारतीय सिनेमा ने कई रंग बदले, एक तरफ जहां फिल्मों के बनने का तरीका बदला तो वहीं दूसरी ओर फिल्म बनाने का नजरिया भी। भारतीय सिनेमा के इस सफर में न सिर्फ मेकर्स बल्कि व्यूअर्स ने भी काफी अहम किरदार निभाया है।

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सोशल मैसेज का तड़का

हर शुक्रवार को सिनेमाघर की खिड़की पर कोई न कोई फिल्म दस्तक देती है। भारतीय सिनेमा की शुरुआत में जो फिल्में बनीं वो अधिक मसालेदार न होकर समाज का आईना थीं, लेकिन दौर बदला और फिल्मों में मसाला का तड़का लगाया जाने लगा। लेकिन एक बार फिर भारतीय सिनेमा ने करवट ली है और फिर से सोशल मैसेज वालीं फिल्मों का दौर बढ़ रहा है। हालांकि फिल्मों के पेश करने का तरीका बदल गया है। ऐसे में समाज को जागरुक जरा फिल्मी स्टाइल में किया जा रहा है। पिछले कुछ सालों में कई ऐसी फिल्में सामने आईं जिन्होंने सोशल मैसेज दिया तो दिया लेकिन साथ ही इनमें मसाले का तड़का भी लगाया गया। इन फिल्मों की लिस्ट में पैडमैन, पीपली लाइव, टॉयलेट- एक प्रेम कथा, हिंदी मीडियम और थ्री इडियट्स जैसी कई शामिल हैं। किसी ने दब्बू सोच पर हमला किया तो किसी ने जिदंगी को अपने तरीके से खुलकर जीने की बात कही। बड़ी बात ये है कि बदलते भारतीय सिनेमा में सोशल मैसेज की फिल्में करने में बड़े एक्टर्स भी पीछे कदम नहीं हटाते हैं। कई फिल्में ऐसी रिलीज हो चुकी हैं जबकि कई फिल्में कतार में हैं। जल्द ही रिलीज होने वाली आयुष्मान खुराना की फिल्म आर्टिकल 15 भी समाज के एक बड़े मुद्दे को दिखाती है। 

बजट कम फिर भी है दम

'बड़ी हिट फिल्म के लिए बड़ा बजट जरूरी है'- इस सोच पर भी बदलते भारतीय सिनेमा ने प्रहार किया है। अब ऐसा देखा जा रहा है कि फिल्म का आइडिया और उसे पेश करने का तरीका, बड़े बजट से ज्यादा अहम हो गया है। पिछले कुछ सालों में कई ऐसी फिल्में सामने आईं जिनका बजट चाहें कम ही क्यों न हो लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने अच्छा कलेक्शन किया है। वहीं कई बड़े बजट की फिल्में भी औंधे मुंह गिरी हैं। छोटे बजट की हिट फिल्मों के लिए साल 2018 एक अच्छा उदाहरण है। उस साल कई कम बजट की फिल्मों ने दोगुना कलेक्शन किया। जिनमें राजी, स्त्री, रेड, सोनू के टीटू की स्वीटी, परी, 102 नॉट आउट, अंधाधुन और बधाई हो जैसी फिल्में शामिल हैं। वहीं उससे पहले न्यूटन, विकी डोनर, फुकरे, सीक्रेट सुपरस्टार और टॉयलेट- एक प्रेम कथा ने भी ऐसा ही कर दिखाया। हालांकि ऐसा कहना भी गलत होगा कि हर कम बजट की फिल्म अच्छा कलेक्शन करती है या फिर सिर्फ कम बजट की फिल्में ही अच्छा कलेक्शन करती हैं चूंकि कई बड़े बजट की फिल्मों ने भी बहुत बड़ा कारोबार किया है। वहीं कई फिल्मों को अपना बजट निकालना भी मुश्किल हो गया।

बायोपिक का बढ़ता चलन

बॉलीवुड में यूं तो बायोपिक फिल्में सिनेमा के शुरुआती काल से ही बन रही हैं लेकिन पहले ये देवी देवताओं की जिंदगी पर बनती थीं। बाद में निर्देशकों ने विषय में थोड़ा बदलाव करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों या नेताओं की जिंदगी पर फिल्में बनानी शुरू की। किसी नेता पर बनी बायोपिक 'गांधी' 1982 में बनी थी। ये फिल्म विश्वभर में पसंद की गयी थी। साथ ही इसे 8 ऑस्कर अवार्ड भी मिले थे। इसका निर्माण-निर्देशन ब्रिटिश फिल्मकार रिचर्ड एटनबरो ने किया था। बदलते सिनेमा में बायोपिक का चलन भी बढ़ा है। ऐसे में न सिर्फ दिग्गजों पर बल्कि उन किस्से, कहानियों और घटनाओं पर भी बायोपिक बनीं जो हमारे देश के लिए अहमियत रखती हैं। बायोपिक की लिस्ट में महेन्द्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर, संजय दत्त, दंगल, नीरजा, मैरी कॉम, केसरी, मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ़ झांसी, द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, ठाकरे और सूरमा जैसी कई फिल्में शामिल हैं। हालांकि कहा जाता है कि कुछ फिल्मों में बॉलीवुड तड़का भी लगाया गया था। वहीं ऐसा नहीं है कि कुछ बायोपिक बनने के बाद इसका सिलसिला थम गया हो चूंकि आगे भी बायोपिक का सिलसिला जारी है। जैसे फिलहाल में सानिया नेहवाल की बायोपिक पर काम जारी है। 

समाज का आईना दिखाती फिल्में

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का, मुल्क, हिंदी मीडियम और इंग्लिश विंग्लिश जैसी कई फिल्मों ने समाज का आईना दिखाने की भी कोशिश की है। फिल्मों में समाज की उन बातों पर ध्यान दिया गया जो हम सबके बीच रहकर भी गुमनाम हैं। आमिर खान की फिल्म थ्री इडियट्स एक सटीक उदाहरण है, फिल्म में उस छोटी सी लेकिन अहम बात पर ध्यान आकर्षित किया गया जिसमें बच्चों को उनके पसंदीदा करियर नहीं चुनने दिया जाता। बचपन से ही उन्हें सिखा और समझा दिया जाता है कि उन्हें डॉक्टर या इंजीनियर बनना है। ऐसे में वो बच्चा कैसे न सिर्फ समाज से बल्कि खुद से समझौता करता है। 
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नए चेहरों को मौका

बदलते सिनेमा में नए चेहरों को भी मौका मिला। हालांकि ये मुद्दा एक अलग है कि वो किसी सेलिब्रिटी के रिश्तेदार या दोस्त है या फिर बिना किसी गॉडफादर के ही इंडस्ट्री में कदम जमाने आए। बदलते चेहरों की ही देन हैं राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना, पकंज त्रिपाठी और सुशांत सिंह राजपूत जैसे सेलेब्स। जिन्होंने अपनी एक्टिंग से अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है। वहीं रणवीर सिंह और आलिया भट्ट जैसे सेलेब्स ने भी हर किरदार में जान डालकर अपना सिक्का जमाया।
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