मैं उच्च शिक्षा हासिल कर डॉक्टर बनना चाहता था। यह 1996 की बात है। मैं अपने चार मित्रों के साथ सीपीएमटी की परीक्षा पास करने के बाद आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में काउंसिलिंग के लिए गया था। सभी का चयन हो गया था, मेरा भी। हम सब बहुत खुश थे और कार से बनारस लौट रहे थे। कार मैं ही चला रहा था। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, लखनऊ से थोड़ा पहले हमारी कार का एक्सीडेंट हो गया। मुझे ज्यादा चोट लगी, मेरे मित्र भी चोटिल हुए। पहले तो लगा फ्रैक्चर है, कुछ दिन में सही हो जाएगा, पर कुछ ही समय बाद पता चला कि मेरी कमर के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया।
मेरे माता-पिता मूलत: राजस्थान के रहने वाले थे, जो बाद में बनारस आकर बस गए। इस हादसे से उबरा नहीं था कि छह महीने बाद ही मेरी मां का निधन हो गया। उन्होंने अपने अंतिम समय जो सीख दी, उसके बल पर मैं आज दूसरों की जिंदगी संवार रहा हूं। उन्होंने मुझसे कहा था, तुम्हारे पास सबसे बड़ी चीज शिक्षा है। अपना कर्म ऊंचा रखना, एक दिन खुद लोग तुम्हारे पैर नहीं, बल्कि तुम्हारा चेहरा देखेंगे। मां की मौत के बाद मैं दो साल तक बनारस के गोदौलिया चौराहे पर स्थित एक चैरिटेबल हॉस्पिटल में भर्ती रहा। मेरा इलाज तो पूरा हो चुका था, लेकिन मैं कहीं जा नहीं सकता था। माता-पिता का पहले ही देहांत हो चुका था। एक भाई थे, पर वह भी मेरी लंबी बीमारी, पूर्ण विकलांगता और खुद की आर्थिक मजबूरियों के कारण साथ छोड़ गए।
उस हादसे के बाद सामान्य जीवन जीना भी मेरे लिए बहुत मुश्किल हो गया था। सबको लगता था कि अब मेरा जीवन खत्म हो गया है, लेकिन मैं जीना चाहता था, शायद यही मेरे इस काम की बड़ी वजह बनी। बनारस से कुछ दूर मिर्जापुर में मेरे एक मित्र का गांव था। एक बार वह मुझे घुमाने के लिए अपने गांव ले गए। वहां कुछ दिन रहने के बाद मेरा मन लगने लगा, तो मेरे दोस्त ने रहने के लिए गांव के बाहर एक छोटा-सा कमरा बना दिया और साथ ही खाने-पीने का इंतजाम भी कर दिया। इतना सब कुछ होने के बाद भी अकेलापन मुझे काटने दौड़ता था। इस बीच मुझे मां के अंतिम शब्द याद आए।
मैंने एक बगीचे में बच्चों को बुलाकर मुफ्त में पढ़ाना शुरू कर दिया। बहुत सारी विसंगतियों के चलते बच्चे पढ़ने नहीं जाते थे। गरीबी के कारण बच्चे अक्सर छोटी उम्र में ही काम करने लग जाते हैं। ऐसे में जब मैंने पढ़ाना शुरू किया, तो पहले दिन कुछ ही बच्चे आए, पर धीरे-धीरे लोगों में विश्वास बढ़ा और लोग अपने बच्चों को मेरे पास पढ़ने के लिए भेजने लगे। जब बच्चे बढ़ने लगे, तो मैंने 'नोवल शिक्षा संस्थान' की शुरुआत की। 18 साल के सफर में इस पाठशाला में हजारों बच्चे पढ़ चुके हैं। ज्यादातर बच्चे वंचित समुदाय से हैं। गरीब बच्चा अगर पढ़ना चाहता है, तो उसकी आगे की पढ़ाई का खर्च मैं क्राउड फंडिंग के जरिए इकट्ठा करता हूं। मेरे कई मित्र भी मेरा सहयोग करते हैं।
एक टीवी चैनल ने मेरे काम के चलते मुझे एक व्हीलचेयर दी, जिससे अब मेरा चारपाई से उठकर घूमना आसान हो गया है। सुबह पांच बजे से लेकर शाम छह बजे तक का मेरा वक्त इन बच्चों के साथ गुजरता है। ये बच्चे हर सुबह मुझे चारपाई से उठाकर व्हीलचेयर पर बिठा देते हैं और मैं पूरा दिन बैठे-बैठे इसी बगीचे में पढ़ाता रहता हूं। यही बच्चे अब मेरी जिंदगी हैं।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित)