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मंजिलें और भी हैंः गरीब बच्चों को शिक्षा देने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी छोड़ी

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समीना बानो - फोटो : Amar Ujala
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मैं अमेरिका में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रही थी। शुरुआत में मुझे अमेरिका की जिंदगी काफी अच्छी लगी, लेकिन जल्द ही मुझे अपने देश की याद आने लगी। मैं सोचती रहती थी कि मुझे मेरे माता-पिता ने इतनी अच्छी शिक्षा दी, इस कारण आज मैं यहां तक पहुंची हूं, लेकिन देश के कई हिस्सों में अब भी बहुत सारे ऐसे बच्चे हैं, जिनको अच्छी शिक्षा मिलना तो दूर, वे स्कूल भी नहीं जा पाते हैं।

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मैं पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर हूं और पुणे की रहने वाली हूं। मेरे पिता वायुसेना में अधिकारी थे, जिस वजह से मेरी स्कूली पढ़ाई देशके अलग- अलग हिस्सों में हुई। आईआईएम, बंगलूरू से एमबीए करने के बाद मैं अमेरिका चली गई। लेकिन नौकरी से मोह छूटा, तो अपने वतन वापस लौट आई।

पुणे या बंगलूरू के बजाय उत्तर प्रदेश जैसे राज्य को चुना 

मैं पुणे में गरीब बच्चों के बीच काम करने के बारे में विचार कर रही थी। मैंने थोड़ी-बहुत योजना भी बना ली। इस बीच मेरे एक दोस्त ने मुझे सुझाव दिया कि पुणे या बंगलूरू जैसे शहरों के बजाय मुझे उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में काम करना चाहिए। मैंने इस सुझाव पर गंभीरता से विचार करने के बाद लखनऊ का रुख कर लिया। यहां आकर मैं किराए का एक घर लेकर रहने लगी। लखनऊ में शिक्षा की हालत जानने के लिए किए गए एक सर्वे दौरान ही मेरी मुलाकात लखनऊ के विनोद यादव से हुई। वे भी इसी क्षेत्र में काम कर रहे थे।

मैंने अपने काम की शुरुआत झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले तकरीबन पचास बच्चों को पढ़ाने के साथ की। कुछ समय बीतने के बाद मुझे लगने लगा कि इससे तो बहुत ही कम बच्चों को लाभ होगा। मैं अधिक से अधिक बच्चों को शिक्षित करना चाहती थी। इसके लिए मैं सरकार का सहयोग चाहती थी, क्योंकि बिना सरकारी सहयोग के यह काम बड़े पैमाने पर मुमकिन नहीं था।

‘भारत अभ्युदय फाउंडेशन’ की स्थापना

इसके बाद मैंने और विनोद ने मिलकर ‘भारत अभ्युदय फाउंडेशन’ की स्थापना की। संस्था के माध्यम से मैं सरकार के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए सिस्टम और पॉलिसी में तालमेल बनाकर उसे सही तरह से लागू करवाने के लिए काम करने लगी।

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‘शिक्षा के अधिकार कानून’ के मुताबिक निजी स्कूलों को अपने यहां पच्चीस प्रतिशत गरीब बच्चों को दाखिला देना जरूरी होता है, जो आमतौर पर स्कूल वाले नहीं करते। मैंने इस पर काम किया, परिणामस्वरूप कुछ ही महीने में उत्तर प्रदेश के लगभग 50 जिलों में बीस हजार से ज्यादा गरीब बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में हुआ। सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए शिक्षा से जुड़ी नीति पर मैं काम कर रही हूं।

150 स्कूलों के प्रिंसिपल और शिक्षकों के साथ वर्कशॉप का आयोजन

छात्रों को वोकेशनल ट्रेनिंग देने के लिए प्रशिक्षण लेने मैं जर्मनी भी गई थी, क्योंकि वहां दी जाने वाली वोकेशनल ट्रेनिंग दुनिया भर में सबसे अच्छी मानी जाती है। मैंने ‘यूनिसेफ’ के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश के नौ जिलों के करीब 150 स्कूलों के प्रिंसिपल और शिक्षकों के साथ एक वर्कशॉप का आयोजन किया, जिसमें बताया गया कि स्कूल के सभी बच्चों में समानता की भावना कैसे लाई जा सकती है, ताकि अमीर और गरीब बच्चों के बीच का फासला कम हो। इसके लिए मैंने ‘बडी सिस्टम’ बनाया है, जिसमें कम पढ़े लिखे माता-पिता और पढ़े लिखे माता-पिता के बीच तालमेल बनाया जाता है। इस काम को आधा दर्जन जिलों में लागू किया जा चुका है।

क्राउड फंडिग के जरिए संस्था का आर्थिक खर्च जुटाने की कोशिश  

मेरी टीम में सात सदस्य हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में करीब पचास वालंटियर भी जुड़े हुए हैं। क्राउड फंडिग के जरिये मैं संस्था का आर्थिक खर्च जुटाने की कोशिश करती हूं, साथ ही मेरे दोस्त और रिश्तेदार भी उनके इस काम में मदद करते हैं। पहले लोग मेरे काम पर भरोसा नहीं करते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं।

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(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित)

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