भारत देश दुनिया में कपास का दूसरा सबसे बढ़ा उत्पादक और कुल क्षेत्रफल के मामले में पहले स्थान पर है। हालांकि देश फसल उत्पादकता स्तर में अभी भी विश्व औसत से नीचे है। । घरेलू कपड़ा उद्योग में कपास की खपत की मांग को पूरा करने के अलावा, कपास के निर्यात से किसानो की आवंदनी बढ़ने के विशेष अवसर उपलब्ध है। कपास हरियाणा की सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसल है और यह प्रदेश की औद्योगिक और अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हरियाणा के फतेहाबाद, सिरसा, हिसार, भिवानी, गुड़गांव, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, मेवात जिलों में कपास उत्पादन के लिए उपयुक्त जलवायु है। यह सूती कपड़ा उद्योग को मूल कच्चा माल प्रदान करती है। हरियाणा में लगभग 65 प्रतिशत आबादी सीधे कृषि में लगी हुई है, जो राज्य की जीडीपी का लगभग 14 प्रतिशत योगदान करती है। हरियाणा में कपास उद्योग इन जिलों में ग्रामीण जनता के सामाजिक-आर्थिक विकास का एक अभिन्न अंग बन गया है। इसके बीजों (बिनौला) का उपयोग दुधारू पशुओं को बेहतर दूध प्राप्त करने के लिए चारे के हिस्से के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
31 मई को हुए बरसात कपास के लिए आवयश्क तापमान को 21-27 oC के बीच नियंत्रित करने में अहम् योगदान देगी । फलने की विकास अवधि के दौरान उज्ज्वल दिन, शुष्क जलवायु और जमीन में पर्यापत नमीं की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बुवाई के 4 से 6 सप्ताह बाद की जानी चाहिए और बाद वाली दो या तीन सप्ताह के अंतराल पर लकीरें पर कपास की बुआई करने और फरो में सिंचाई करने से पानी की काफी मात्रा बचती है। मौसमी बारिश के कारण कपास में सिंचाई की आवश्यकता कम रह जायेगी अगर आप सही समय पर उचित कृषि प्रथाओं से खेती करते हो। कपास में शुरुआती विकास के दौरान पानी का ठहराव बहुत संवेदनशील होता है, जिसके परिणामस्वरूप कपास की कम उपज होती है। इसलिए, ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर, स्थिर पानी को बाहर निकालने का उचित प्रबन्ध करे । कपास की खेती के लिए नमी की आवश्यकता के कई महत्वपूर्ण चरण चरण होते हैं, प्रत्येक चरण के दौरान नमी महत्वपूर्ण है। यदि फसल इन चरणों के दौरान पानी के तनाव से गुजरता है, तो पैदावार काफी कम हो जाती है। सिंचाई के संबंध में निम्नलिखित बिन्दुओ को ध्यान में रखना चाहिए।
हरियाणा राज्य के शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्रों में बन्डिंग, लेवलिंग, कम्पार्टमेंटल, मल्चिंग, और निराई पारंपरिक तकनीकों से खेत की मिट्टी में ही नमी संरक्षण और जल संचयन कर सकते है। हल, हैरो और अन्य कृषि यांत्रिक उपकरणों का उपयोग करने से मिट्टी में जल धारण क्षमता बढ़ाती है, कीटों के जीवनचक्र को बाधित करती है, मिट्टी में पोषक तत्वों वितरित करती है और जड़ों को हवा देने और खरपतवारों पर नियंत्रण आसान करती है। राज्य के अतिशोषित ब्लॉकों में सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों से कपास की फसल उगाई जा सकती है। ड्रिप सिंचाई जहां पानी की कमी और पानी की खराब गुणवत्ता फसल उत्पादन में बाधा बनती है उन क्षेत्रों में फायदेमंद और उपयोग सिद्ध हुई है। ड्रिप के साथ पानी की बहुत सटीक सिंचाई की जा सकती है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली से दैनिक आधार पर फसल की बाष्पीकरणीय मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त पानी की आपूर्ति करते हुए अधिकतम उपज को बढ़ाता है।
एसजीटी यूनिवर्सिटी नई खोज, नए शोध के लिए एक पावरहाउस की तरह है। यहाँ हमेश नए क्षेत्रों में शोध कार्य होते रहते हैं जो स्थानीय लोगों के लिए भी उपयोगी होते हैं। हमारे छात्र, अध्यापक और शोधार्थी शोध को लेकर अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। सामुदायिक सेवा में भी एसजीटी यूनिवर्सिटी महत्त्वपूर्ण भूमिका में है। शोध भागीदारी के रूप में यूनिवर्सिटी शोधार्थियों और स्थानीय व्यवसाय के बीच सेतु की तरह है।
- Advertorial