भारत में, 70 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और कृषि पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर है। भारतीय कृषि में छोटे और सीमांत किसान जोत इसकी विशेषता है। बढ़ी हुई जनसंख्या और पशुधन की अधिकतम संख्या भोजन, और चारा की एक बड़ी चुनौती है। कृषि में हरी, सफेद, नीली, भूरी और पीली क्रांति ने हमें कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भर बनायां है। कृषि उत्पादन और उत्पादकता के हमारे वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने में उपयोग की जाने वाली प्रौद्योगिकियॉ हमारे प्राकृतिक संसाधनों का बड़ी मात्रा में उपयोग करती हैं। संसाधन का अंधाधुन्द प्रयोग व दोषपूर्ण उत्पादन प्रथाओं के असंतुलित और गैर-विवेकपूर्ण उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता, मिट्टी का क्षरण, विषाक्तता, जल संसाधनों में कमी, भूमिगत जल प्रदूषण, लवणता, खरपतवार प्रतिरोधता, कीटों की रोकथाम, कम गुणवत्ता वाले उत्पादन और जलवायु परिवर्तन पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। फसल विविधीकरण कृषि में टिकाऊ उत्पादन और जलवायु परिवर्तन पर रणनीति बनाने के लिए प्रमुख विकल्पों हो सकता है। फसल विविधीकरण सूखे या असमान वर्षा की प्रतिकूल जलवायु वाली परिस्थितियों में फसल की विफलता के जोखिम को कम करता है।
कृषि क्षेत्र की कुल जीडीपी में हिस्सेदारी 1980-81 (34.8%) से घटकर 2020 में लगभग (14%) होने के आसार है। कृषि क्षेत्र भारत की 60 प्रतिशत आबादी को रोजगार प्रदान करता है, इसलिए रोजगार के वैकल्पिक स्रोतों का विकास जैसे, कृषि उद्योग, ई-मार्केटिंग, जैविक खेती, अग्रिम सिंचाई प्रणाली, विस्तार, कम लागत के इनपुट, न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति, सहायक बुनियादी ढांचे, आदि को इस क्षेत्र में अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को बढ़ाने के लिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए। भारत ने साठ के दशक के बाद कृषि क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है क्योंकि इस अवधि में गेहूं और चावल का उत्पादन क्रमशः 10 और 4 गुना बढ़ा है। विविधीकरण में विभिन्न कृषि गतिविधियों जैसे कि डेयरी, पोल्ट्री, सूअर, बकरी, भेड़ पालन, खरगोश पालन, आदि में संलग्न करने के लिए संदर्भित किया जाता है। विविधीकरण कृषि आय को बढ़ा के लिए एक आवश्यक रणनीति बन सकती है, जो फसल की खराबी के जोखिम को कम करती है और विदेशी मुद्रा कमाने में मदद करती है।
दुनिया भर में 75% खाद्य आपूर्ति सिर्फ कुछ अनाज और दालें वाली फसलों की खेती पर निर्भर करती है। खाद्य प्रणालियों में लचीलापन में सुधार के लिए पर अधिक जोर दिया जाता है । यह निर्भरता प्रकृति संसाधनों दोहन, जलवायु परिवर्तन, कीट और रोगों के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाती है, जो की संतुलित पर्यावरण के लिए हानिकारक सिद्ध होती है। कृषि विविधता इन चुनौतियों से निपटने में मदद करती है। कृषि विविधता किसानों को विकल्प प्रदान करती है, जिसका सीधा असर पोषण, सामाजिक और आर्थिक विकास पर पड़ता है। यह कृषि उर्वरक, पानी व प्राकृतिक संसाधन विवेकपूर्ण और संरक्षित तरीके से उपयोग करते हुए पैदावार बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है । पारिस्थितिक: कृषि उत्पादन के लिए फसल रोटेशन, नई संकर फसलें, बेहतर पशुधन नस्लें, उन्नत बीजों की बेहतर पोषण और एग्रोफोरेस्ट्री आदि उत्पादन के तरीके पर काम करती हैं।
कृषि विविधीकरण गरीबी उन्मूलन और किसानों के जीवन स्तर में सुधार के लिए एक हथियार के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। कृषि विविधीकरण देश को सामाजिक-आर्थिक उत्थान, रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण के अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करेगा। भारत कृषि क्षेत्र वर्तमान युग में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के प्रभाव से उत्पन्न आंतरिक और बाहरी दबावों का सामना कर रहा है। स्थायी आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और स्थायी विकास सुनिश्चित करने के लिए आने वाले वर्षों में कृषि विविधीकरण एक कुशल और प्रभावी प्रबंधन सिद्ध होगा। इसलिए विदेशी प्रतिस्पर्धा का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए भारतीय कृषि में विविधता आनी चाहिए और प्रत्येक किसान को अपनी कृषि गतिविधियों में विविधता लानी होगी। उदारीकरण और वैश्वीकरण के कारण उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार व किसानों को उपयुक्त कृषि विविधीकरण नीति का पालन करना होगा।