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दिल्ली के सबसे बड़े गांव की पीड़ा : सिमटता गया दायरा, बनती गईं इमारतें

Mon, 26 Jul 2021 07:27 AM IST
दुष्यंत शर्मा आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली

सार

  • दिल्ली के सबसे बड़े गांव का रकबा दस गुना घट गया, गांव में बन गया कूड़े का पहाड़
  • गड्ढा पाटने के नाम पर गांव में कूड़ा डालना शुरू किया, आज है गाजीपुर लैंडफिल साइट
  • जब पछुआ हवा बहती है तो घड़ौली के लोगों का मन करता है कि गांव छोड़कर चले जाएं
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गांव का शिव मंदिर और पास में गाजीपुर का कूड़े का पहाड़... - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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दिल्ली के सबसे बड़े गांव घड़ौली का रकबा आज सिमटकर दस गुना कम हो गया है। गांव की जमीन पर बिल्डिंगें बनती गईं, कभी 5000 बीघे में फैला गांव 500 बीघे में सीमित रह गया। घड़ौली के लोगों का मानना है सरकार ने उनके गांव में गड्ढा पाटने के नाम पर कूड़ा डालना शुरू किया और उन लोगों के निरंतर विरोध के बावजूद यहां गाजीपुर लैंडफिल साइट के रूप में कूड़े का पहाड़ खड़ा हो गया।

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घड़ौली गांव करीब 516 वर्ष पुराना है। गांव के बुजुर्ग चौधरी जय नरायण ने बताया कि यह चौहानों का खेड़ा है, बाद में यहां गूजर आए। आज सर्वाधिक आबादी गूजरों की हैं। मौजूदा समय ब्राह्मण, बाल्मीकि, प्रजापति, जोगी, मस्लिम समाज की आबादी भी रहती है। सपेरों की अलग बस्ती बस चुकी है। गाजीपुर लैंडफिल साइट गांव की आबादी से करीब 400 मीटर दूरी पर है। गांव और लैंडफिल साइट के बीच से हिंडन-यमुना नहर गुजरती है। यह भी नाले की शक्ल ले चुकी है। करीब 35 साल से गांव के लोग कचरे की दुर्गंध और चर्म रोग, स्वास रोग और कई दूसरी गंभीर बीमारियों का दंश झेलने को मजबूर हैं। जब पछुआ हवा बहती है तो घड़ौली के लोगों का मन करता है कि वह गांव छोड़कर कहीं और चले जाएं। 

5000 बीघा से 500 बीघे तक पहुंचे
चौधरी जयनरायण ने जमीनों के कागजात दिखाते हुए बताया कि 19 अगस्त 1976 को इमरजेंसी के समय सरकार ने घड़ौली गांव की 2250 बीघा जमीन 1.5 रुपया प्रति गज के हिसाब से जबरन उन लोगों से ली। मौजूदा समय मयूर विहार फेज-3 इसी जमीन पर बसा है। 500 बीघे जमीन में हिंडन-यमुना नहर निकल गई। 16 बीघा जमीन सपेरा बस्ती को दे दी गई। 1984-85 में गांव की जमीन पर मुल्ला कॉलोनी बसी, सरकार ने गांव की 25 बीघा जमीन कब्रिस्तान के लिए अधिग्रहित कर ली।
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इससे बड़ा रकबा केवल कड़कड़डूमा का
दिल्ली में कड़कड़डूमा गांव के बाद घड़ौली का रकबा सबसे बड़ा था। गांव के लोग कहते हैं कि सरकार ने उनके साथ सौतेला व्यवहार किया। पहले गांव में कूड़े का पहाड़ खड़ा किया और फिर पास में मुर्गा और बकरा मंडी बना दी। यहां से उठने वाली मांस की दुर्गंध लोगों को बीमार बना रही है।

एमसीडी कमिश्नर की हठधर्मी नहीं भूले
घड़ौली के बुजुर्ग 1976 में तत्कालीन एमसीडी कमिश्नर बहादुर राम टमटा की हठधर्मी नहीं भूले हैं। 95 साल के चौधरी रामफल बताते हैं कि कमिश्नर ने उनकी जमीनें लेने के लिए खड़ी फसलों को कटवा दिया था। जिस जमीन को लेना था, उसे हर हाल में ले लिया था।

जितना पुराना गांव उतना पुराना शिव मंदिर
दिल्ली में डेढ़ा गोत्र के गूजरों के 24 गांवों की आस्था श्याम गिरी बाबा में है। श्याम गिरी बाबा का आश्रम शास्त्री पार्क में था, आज भी यहां उनका मंदिर है। वहीं घड़ौली गांव में गूजरों ने भगनाव शिव का प्राचीन मंदिर बनाया था। आज भी गांव के चौक पर प्राचीन शिव मंदिर स्थित है। गांव में विभिन्न जातियों के लोग शांतिपूर्ण तरीके से रहते हैं। शाम को मंदिर की चौपाल में बुजुर्ग इकट्ठा होते हैं।
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चमड़े की दुर्गंध से लोग सबसे ज्यादा परेशान
रात को मच्छर व दिन में दुर्गंध जीने नहीं देती, लेकिन पहले ऐसा नहीं था, जहां गाजीपुर लैंडफिल साइट है वहां 20-25 फुट गहरा गड्ढा था
- चौधरी जयनरायण

यहां खुले आसमान के नीचे नहीं बैठा जा सकता, आसमान में चील मांस का टुकड़ा लेकर उड़ती हैं, कभी भी आसमान से मांस के लोथड़े गिर जाते हैं
- सुनील चौधरी

जब पछुआ हवा चलती है तो मुर्गा, बकरा मंडी की दुर्गंध आती है, यहां एक मिनट रुकने का मन नहीं करता, लेकिन घर छोड़कर जा भी नहीं सकते
- रवीन्द्र चौधरी

गांव से नहर निकली तो यह गांव बहुत खुशहाल हो गया था, लेकिन लैंडफिल साइट बनने के बाद गांव को जैसे किसी की नजर लग गई
- चौधरी रामफल

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